मदर टेरेसा जन्म दिवश 2017 ,कौन थी मदर टेरेसा, और क्यों मनाते हैं भारत के लोग उसका जन्म दिवश ?

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मदर टेरेसा जन्म दिवश 2017 : कैथोलिक धर्म मैं जन्म लेने वाली समाज सुधारक ,शांति की दूत और अनाथों की सेवा करने वाली मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को मेसीडोनिया में में हुआ था | 26 अगस्त को मदर टेरेसा के जन्म दिवश के रूप मैं पूरे भारत मैं मनाया जाता हैं मदर टेरेसा जब मात्र बारह साल की थीं तभी इन्हें ये अनुभव हो गया था कि वो अपना सारा जीवन मानव सेवा में लगायेंगी | और वास्तव मैं माँ ने वही करके दिखाया ,मदर टेरेसा ने अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता की भलाई मैं लगाया | दया की देवी, दीन हीनों की माँ तथा मानवता की मूर्ति मदर टेरेसा एक ऐसी सन्त महिला थीं जिनके माध्यम से हम ईश्वरीय प्रकाश को देख सकते थे|इसमें कोई संसय नही है| उन्होंने अपना जीवन असहाय, पीड़ित, निर्धन तथा दुखी लोगों की सेवा में बिता दिया|अनाथ बच्चों को फ्री मैं शिक्षा दी और उन्हें परिवार बसने के लायक बनाया | जो अपने स्वार्थ को छोडकर दूसरों के लिए जीने वाली निस्वार्थ भाव से पराधीन और गरीबो की सेवा करने वाली मदर टेरेसा जिनका पूरा जीवन प्रेरणादायक हैं एसी ही एक महान हस्ती मदर टेरेसा ,दया ,निस्वार्थ भाव ,प्रेम की मूर्त मदर टेरेसा ने अपना सम्पूर्ण जीवन दूसरों की सेवा मैं न्योछावर क र दिया | मदर टेरेसा भारत की न होते हुए भी वह भारत के लोगों को अपना दिल दे बैठी और और उन्होंने भारत के गरीब,लाचार और अनाथ लोगों की सेवा करे की सोच ली | विदेशी होते हुए भी भारत सरकार ने उन्हें भारत की नागरिकता दी | मदर टेरेसा ने मानवता की भलाई के लिए कई सराहनीय कार्य किये ,जिनका उल्लेख हम निचे करने जा रहे हैं |

मदर टेरेसा का जीवन परिचय

मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 में सोप्जे मैसिडोनिया में हुआ था। 12 वर्ष की छोटी−सी उम्र में ही उन्होंने ‘नन’ बनने का निर्णय किया और 18 वर्ष की आयु में कलकत्ता में ‘आइरेश नौरेटो नन’ मिशनरी में शामिल हो गयीं। वे सेंट मैरी हाईस्कूल कलकत्ता में अध्यापिका बनीं और लगभग 20 वर्ष तक अध्यापन के द्वारा ज्ञान बांटा। लेकिन उनका मन कहीं और था। कलकत्ता के झोपड़ पट्टी में रहने वाले लोगों की पीड़ा और दर्द ने उन्हें बैचेन−सा कर रखा था। देश में गरीबी और भुखमरी की स्थिति काफी गंभीर थी। बीमारी, अशिक्षा, छुआछूत, जातिवाद एवं महिला उत्पीड़न जैसी सामाजिक बुराइयां अपनी पराकाष्ठा पर थीं। इन स्थितियों ने उन्होंने आन्दोलित कर दिया। यही कारण था कि 36 वर्ष की आयु में उन्होंने अति निर्धन, असहाय, बीमार, लाचार एवं गरीब लोगों की जीवनपर्यंत सेवा एवं मदद करने का मन बना लिया। इसके बाद मदर टेरेसा ने पटना के होली फॅमिली हॉस्पिटल से आवश्यक नर्सिग ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में वापस कोलकाता आ गईं और वहां से पहली बार तालतला गईं, जहां वह गरीब बुजुर्गों की देखभाल करने वाली संस्था के साथ जुड़ गयीं। उन्होंने मरीजों के घावों को धोया, उनकी मरहम पट्टी की और उनको दवाइयां दीं। धीरे−धीरे उन्होंने अपने कार्य से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

समाज सुधारक और शांति की दूत मदर टेरेसा

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मदर टेरेसा दलितों एवं पीडितों की सेवा में किसी प्रकार की पक्षपाती नहीं है। उन्होनें सद्भाव बढाने के लिए संसार का दौरा किया है। उनकी मान्यता है कि ‘प्यार की भूख रोटी की भूख से कहीं बडी है।’ उनके मिशन से प्रेरणा लेकर संसार के विभिन्न भागों से स्वय्ं-सेवक भारत आये तन, मन, धन से गरीबों की सेवा में लग गये। मदर टेरेसा क कहना है कि सेवा का कार्य एक कठिन कार्य है और इसके लिए पूर्ण समर्थन की आवश्यकता है। वही लोग इस कार्य को संपन्न कर सकते हैं जो प्यार एवं सांत्वना की वर्षा करें – भूखों को खिलायें, बेघर वालों को शरण दें, दम तोडने वाले बेबसों को प्यार से सहलायें, अपाहिजों को हर समय ह्रदय से लगाने के लिए तैयार रहें।

मदर टेरेसा की नीली बार्डर वाली साड़ी की विशेषता

संत की उपाधि से सम्मानित मदर टेरेसा की मशहूर नीले बार्डर वाली साड़ी को मिशनरीज ऑफ चैरिटी की ‘इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी’ के तौर पर मान्यता दी गयी है. इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के वकील बिस्वजीत सरकार ने कहा, ‘भारत सरकार की व्यापार चिह्न रजिस्ट्री ने नीले बार्डर की साड़ी के पैटर्न के लिये व्यापार चिह्न का पंजीकरण मंजूर कर दिया है.’ अल्बानियाई मूल की मदर टेरेसा थोड़े समय के लिये नन भी रहीं. साल 1948 से वह कोलकाता की सड़कों पर गरीबों एवं निसहायों की सेवा करने लगीं. नीले बार्डर वाली सफेद रंग की साड़ी उनकी पहचान बन गयी थी, जिसका बाहरी किनारा दो अंदरूनी किनारों से अधिक चौड़ा होता था.

सरकार ने बताया, ‘नीले बार्डर की डिजाइन वाली साड़ी मिशनरीज ऑफ चैरिटी की नन पहना करती थीं, जिसे चार सितंबर 2016 को मदर को सम्मानित किये जाने के दिन संगठन के लिये इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के तौर पर मान्यता दी गयी.’

ट्यूमर ठीक कर संत बनीं मदर टेरेसा

1997 में मदर टेरेसा का निधन हो गया था. लेकिन मदर टेरेसा के नाम से दो बीमारियों के चमत्कारिक ढंग से ठीक होने के बाद वेटिकन ने उन्हें संत बनाने का रास्ता साफ़ कर दिया था | संत का दर्जा पाने के लिए कम से कम दो चमत्कार करना ज़रुरी है.

वेटिकन के अनुसार साल 2002 में मदर टेरेसा से प्रार्थना करने के बाद एक भारतीय महिला मोनिका बेसरा के पेट का ट्यूमर चमत्कारिक ढंग से ठीक हो गया था |इसी तरह वेटिकन ने टेरेसा से जुड़े एक और चमत्कार की पुष्टि की थी.2008 में ब्राज़ील की एक महिला का ब्रेन ट्यूमर ठीक हो गया.इसे पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा के दूसरे चमत्कार के रूप में मान्यता दे दी. इसके बाद अगले साल यानी साल 2009 में उन्हें संत बनाए जाने का रास्ता साफ़ हो गया था.मदर टेरेसा को 2003 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने धन्य घोषित किया था जो संत बनाए जाने की प्रक्रिया का पहला चरण है |
मदर टेरेसा को कोलकाता की झुग्गी बस्तियों में उनके काम के लिए शांति के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.उनका निधन 87 साल की उम्र में हुआ था. उन्होंने 1950 में मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी की शुरुआत की थी.

मदर टेरेसा को मिले पुरस्कार और सम्मान

मदर टेरेसा को मानवता की सेवा के लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उन्हें पहले पद्मश्री (1962) और बाद में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ (1980) से अलंकृत किया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने उन्हें वर्ष 1985 में मेडल ऑफ फ्रीडम से नवाजा। मानव कल्याण के लिए किये गए कार्यों की वजह से उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। उन्हें यह पुरस्कार गरीबों और असहायों की सहायता करने के लिए दिया गया था। मदर ने नोबेल पुरस्कार की धन−राशि को भी गरीबों की सेवा के लिये समर्पित कर दिया।

मदर टेरेसा को संत की उपाधि

09 सितम्बर 2016 को वेटिकन सिटी में पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा को संत की उपाधि से विभूषित किया

मदर टेरेसा ने अनाथ और बेसहाय लोगों के लिए किया अपना जीवन समर्पित

आजीवन सेवा का संकल्प : 1981 ई में आवेश ने अपना नाम बदलकर टेरेसा रख लिया और उन्होने आजीवन सेवा का संकल्प अपना लिया। इन्होने स्वयं लिखा है – वह 10 सितम्बर 1940 का दिन था जब मैं अपने वार्षिक अवकाश पर दार्जिलिंग जा रही थी। उसी समय मेरी अन्तरात्मा से आवाज़ उठी थी कि मुझे सब कुछ त्याग कर देना चाहिए और अपना जीवन ईश्वर एवं दरिद्र नारायण की सेवा कर के कंगाल तन को समर्पित कर देना चाहिए।”

मैला ढोने वालों के सम्मान के लिए टेरेसा ने पूरी जिंदगी नीली धारी वाली सफेद साड़ी पहनी थी.

मदर शांति की पैगम्बर एवं शांतिदूत महिला थीं, वे सभी के लिये मातृरूपा एवं मातृहृदया थीं। परिवार, समाज, देश और दुनिया में वह सदैव शांति की बात किया करती थीं। विश्व शांति, अहिंसा एवं आपसी सौहार्द की स्थापना के लिए उन्होंने देश−विदेश के शीर्ष नेताओं से मुलाकातें कीं और आदर्श, शांतिपूर्ण एवं अहिंसक समाज के निर्माण के लिये वातावरण बनाया। कहा जाता है कि जन्म देने वाले से बड़ा पालने वाला होता है। मदर टेरेसा ने भी पालने वाले की ही भूमिका निभाई। अनेक अनाथ बच्चों को पाल−पोसकर उन्होंने उन्हें देश के लिए उत्तम नागरिक बनाया। ऐसा नहीं है कि देश में अब अनाथ बच्चे नहीं हैं लेकिन क्या मदर टेरेसा के बाद हम उनके आदर्शों को अपना लक्ष्य मानकर उन्हें आगे नहीं बढ़ा सकते?

मार्च 1997 में सिस्टर निर्मला ने मदर टेरेसा की पदवी संभाली थी. वो मिशनरी ऑफ चैरिटी की लीडर बनीं.

मदर टेरेसा वास्तव में प्रेम और शांति की दूत थीं। उनका विश्वास था कि दुनिया में सारी बुराइयाँ व्यक्ति से पैदा होती हैं। अगर व्यक्ति प्रेम से भरा होगा तो घर में प्रेम होगा, तभी समाज में प्रेम एवं शांति का वातावरण होगा और तभी विश्वशांति का सपना साकार होगा। उनका संदेश था हमें एक−दूसरे से इस तरह से प्रेम करना चाहिए जैसे ईश्वर हम सबसे करता है। तभी हम विश्व में, अपने देश में, अपने घर में तथा अपने हृदय में शान्ति ला सकते हैं। उनके जीवन और दर्शन के प्रकाश में हमें अपने आपको परखना है एवं अपने कर्तव्य को समझना है। तभी हम उस महामानव की जन्म जयन्ती मनाने की सच्ची पात्रता हासिल करेंगे एवं तभी उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि समर्पित करने में सफल हो सकेंगे।

5 सितंबर 1997 को दिल का दौरा पड़ने से मदर टेरेसा का कोलकाता में निधन हो गया था.

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