रामदेव जी महाराज का मेला रुणीजा धाम रामदेवरा : कोन थे रामदेवजी महाराज | और क्यों जाने जाते है चमत्कारी महाराज रामसापीर के नाम से ?

बाबा रामदेव जी महाराज का जन्म और परिचय : लोक देवता और पीरों के पीर बाबा रामदेव जी महाराज का जन्म भाद्रपद सुक्ल पक्ष की दूज के दिन तोमर वंश के राजपूत तथा रुणीचा के शासक अजमल जी के घर हुआ | पिता का नाम अजमालजी तंवर, माता का नाम मैणादे, पत्नी का नाम नेतलदे, गुरु का नाम बालीनाथ, घोड़े का नाम लाली रा असवार था। कहा जाता हैं की रामदेवजी महाराज ने विक्रम संवत 1442 में उन्होंने रुणिचा में जीवित समाधि ली थी । बाबा रामदेव को द्वारिका‍धीश (श्रीकृष्ण) का अवतार माना जाता है। इन्हें पीरों का पीर ‘रामसा पीर’ कहा जाता है। सबसे ज्यादा चमत्कारिक और सिद्ध पुरुषों में इनकी गणना की जाती है। बाबा रामदेव हिन्दू-मुस्लिम एकता के जनक माने जाते हैं | पाकिस्तान की सीमा से जुड़े राजस्थान के जैसलमेर जिले के रामदेवरा मैं बाबा का रुनिचा धाम हैं | बाबा राम देवजी महाराज के चरणों मैं धुक देने के लिए हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के अनुयाई आते हैं | इसलिय रामदेवजी महाराज को रामसा पीर के नाम से जाना जाता हैं | रामसापीर बाबा रामदेवजी महाराज का मेला भाद्र पद सुक्ला की दूज से लेकर भाद्रपद की पूर्णिमा तक बाबा का मेला लगता हैं | दूर दूर से चलकर लोग उनके दर्शन करने के लिए आते हैं |

baba ramdevji ka ghoda

बाबा रामदेव जी महाराज का मेला :

बाबा रामदेवजी महाराज का मेला भाद्र पद सुक्ला की दूज से लेकर भाद्रपद की पूर्णिमा तक चलता हैं | हिन्दू और मुसलमानों के देवता रामदेवजी महाराज का मेला पुरे भारत देश मैं बड़े ही जोर सर से मनाया जाता हैं | लेकिन रामदेवजी महाराज का सबसे बड़ा स्थान राजस्थान के राम देवरा मैं जिसे रुनिचा धाम के नाम से जाना जाता हैं |

बाबा रामदेव जी महाराज की जीवन गाथा

एक बार अनंगपाल तीर्थयात्रा को निकलते समय पृथ्वीराज चौहान को राजकाज सौंप गए। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद पृथ्वीराज चौहान ने उन्हें राज्य पुनः सौंपने से इंकार कर दिया। अनंगपाल और उनके समर्थक दुखी हो जैसलमेर की शिव तहसील में बस गए। इन्हीं अनंगपाल के वंशजों में अजमल और मेणादे थे। नि:संतान अजमल दंपत्ति श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक थे। एक बार कुछ किसान खेत में बीज बोने जा रहे थे कि उन्हें अजमलजी रास्ते में मिल गए। किसानों ने नि:संतान अजमल को शकुन खराब होने की बात कहकर ताना दिया। दुखी अजमलजी ने भगवान श्रीकृष्ण के दरबार में अपनी व्यथा प्रस्तुत की। भगवान श्रीकृष्ण ने इस पर उन्हें आश्वस्त किया कि वे स्वयं उनके घर अवतार लेंगे। बाबा रामदेव के रूप में जन्मे श्रीकृष्ण पालने में खेलते अवतरित हुए और अपने चमत्कारों से लोगों की आस्था का केंद्र बनते गए। इसलिए रामदेवजी महाराज को क्रष्ण का अवतार मन जाता हैं|

दलितों के मसीहा (मेघवालों ) के बाबा रामदेव जी महाराज :

बाबा रामदेव ने छुआछूत के खिलाफ कार्य कर दलित हिन्दुओं का पक्ष ही नहीं लिया बल्कि उन्होंने हिन्दू और मुस्लिमों के बीच एकता और भाईचारे को बढ़ाकर शांति से रहने की शिक्षा भी दी। बाबा रामदेव पोकरण के शासक भी रहे, लेकिन उन्होंने राजा बनकर नहीं अपितु जनसेवक बनकर गरीबों, दलितों, असाध्य रोगग्रस्त रोगियों व जरूरतमंदों की सेवा भी की। इसिलिय राजस्थान मैं मेघवाल समाज में बाबा को ज्यादा मान्यता दी जाती हैं |

बाबा रामदेवजी का घोडा

बाबा रामदेवजी का घोडा बाबा की सवारी के लिए पूजा जाता है कहते है बाबा रामदेव ने बचपन में अपनी माँ मैणादे से घोडा मंगवाने की जिद कर ली थी. बहुत समझाने पर भी बालक रामदेव के न मानने पर आखिर थक हारकर माता ने उनके लिए एक दरजी ( रूपा दरजी) को एक कपडे का घोडा बनाने का आदेश दिया तथा साथ ही साथ उस दरजी को कीमती वस्त्र भी उस घोड़े को बनाने हेतु दिए.घर जाकर दरजी के मन में पाप आ गया और उसने उन कीमती वस्त्रों की बजाय कपडे के पूर( चिथड़े) उस घोड़े को बनाने में प्रयुक्त किये ओर घोडा बना कर माता मैणादे को दे दिया माता मैणादे ने बालक रामदेव को कपडे का घोड़ा देते हुए उससे खेलने को कहा परन्तु अवतारी पुरुष रामदेव को दरजी की धोखाधड़ी ज्ञात थी. अतः उन्होंने दरजी को सबक सिखाने का निर्णय किया ओर उस घोड़े को आकाश में उड़ाने लगे यह देखकर माता मैणादे मन ही मन में घबराने लगी उन्होंने तुरंत उस दरजी को पकड़ कर लाने को कहा दरजी को लाकर उससे उस घोड़े के बारे में पूछा तो उसने माता मैणादे व बालक रामदेव से माफ़ी मांगते हुए कहा कि उसने ही घोड़े में धोखाधड़ी की है ओर आगे से ऐसा न करने का वचन दिया. यह सुनकर रामदेव जी वापिस धरती पर उतर आये व उस दरजी को क्षमा करते हुए भविष्य में ऐसा न करने को कहा इसी धारणा के कारण ही आज भी बाबा के भक्तजन पुत्ररत्न की प्राप्ति हेतु बाबा को कपडे का घोडा बड़ी श्रद्धा से चढाते है |

रामसापीर : संत बाबा रामदेवजी के 5 चमत्कार

बाबा ने अपने जीवनकाल में लोगों की रक्षा और सेवा करने के लिए उनको कई चमत्कार दिखाए। आज भी बाबा अपनी समाधि पर साक्षात विराजमान हैं। आज भी वे अपने भक्तों को चमत्कार दिखाकर उनके होने का अहसास कराते रहते हैं। आज तक बाबा रामदेवजी महाराज ने कई चमत्कार किये है लेकिन उनमे से हम आपको 5 चमत्कारों के बारे मैं बताने जा रहे हैं |

1: भैरव राक्षस का वध :

सदियों पहले की बात हैं भैरव नाम के एक राक्षस ने पोकरण में आतंक मचा रखा था। प्रसिद्ध इतिहासकार मुह्नौत नैनसी के ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ नामक ग्रंथ में इस घटना का उल्लेख मिलता है।भैरव राक्षस का आतंक पोखरण क्षेत्र में 36 कोष तक फैला हुआ था। यह राक्षस मानव की गंध सूंघकर उसका वध कर देता था। बाबा के गुरु बालीनाथजी के तप से यह राक्षस डरता था, किंतु फिर भी इसने इस क्षेत्र को जीवन रहित कर दिया था। अंत में बाबा रामदेवजी बालीनाथजी के धूणे में गुदड़ी में छुपकर बैठ गए। जब भैरव राक्षस आया और उसने गुदड़ी खींची तब अवतारी रामदेवजी को देखकर वह अपनी पीठ दिखाकर भागने लगा और कैलाश टेकरी के पास गुफा में जा घुसा। वहीं रामदेवजी ने घोड़े पर बैठकर उसका वध कर दिया था।

2. रामदेवजी मक्का के पीर के रूप मैं :

कहते हैं कि चमत्कार होने से लोग गांव-गांव से रुणिचा आने लगे। यह बात रुणिचा और आसपास के गांव के मौलवियों को नहीं भाई। उन्हें लगा की इस्लाम खतरे में है। उनको लगा कि मुसलमान बने हिन्दू कहीं फिर से मुसलमान नहीं बन जाएं तो उन्होंने बाबा को नीचा दिखाने के लिए कई उपक्रम किए। जब उन पीरों और मौलवियों के प्रयास असफल हुए तब उन्होंने यह बात मक्का के मौलवियों और पीरों से कही। उन्होंने कहा कि भारत में एक ऐसा पीर पैदा हो गया है, जो अंधों की आंखें ठीक कर देता है, लंगड़ों को चलना सिखा देता है और यहां तक वह मरों को जिंदा भी कर देता है।ये सभी चमत्कार बाबा ने करके दिखाए ,तभी जाकर आज भी मुसलमान हिन्दू देवता तेजाजी महाराज को राम्सपिर के नाम से जानते है और उसकी पूजा करते हैं |

3. रानी नेतल को परचा :

एक बार रानी नेतलदे ने रंगमहल में रामदेवजी से पूछा-हे प्रभु! आप तो सिद्धपुरुष हैं, बताइए मेरे गर्भ में क्या है- पुत्र या पुत्री? इस पर रामदेवजी ने कहा कि तुम्हारे गर्भ में पुत्र है और उसका नाम सादा रखना है। रानी का संशय दूर करने के लिए रामदेवजी ने अपने पुत्र को आवाज दी। इस पर अपनी माता के गर्भ से ही वह बोल उठा। इस तरह उस शिशु ने अपने पिता के वचनों को सिद्ध कर दिया। अर्थात आवाज के अर्थ से उनका नाम रखा गया। रामदेवरा से 25 किमी दूर ही उनके नाम से गांव बसा हुआ है।

4. रामदेवजी ने मेवाड़ के सेठ दलाजी को दिया सन्तान का सुख

कहते हैं कि मेवाड़ के एक गांव में दलाजी नाम का एक महाजन रहता था।। धन-संपत्ति तो उसके पास खूब थी, लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी। किसी साधु के कहने पर वह रामदेवजी की पूजा करने लगा। उसने अपनी मनौती बोली कि यदि मुझे पुत्र प्राप्ति हो जाएगी तो सामर्थ्यानुसार एक मंदिर बनवाऊंगा।इस मनौती के 9 माह पश्चात उसकी पत्नी के गर्भ से पुत्र का जन्म हुआ। वह बालक जब 5 वर्ष का हो गया तो सेठ और सेठानी उसे साथ लेकर कुछ धन-संपत्ति लेकर रुणिचा के लिए रवाना हो गए। मार्ग में एक लुटेरा भी उनके साथ यह कहकर साथ हो लिया कि वह भी रुणिचा दर्शन के लिए जा रहा है। थोड़ी देर चलते ही रात हो गई और अवसर पाकर लुटेरे ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर दिया। उसने कटार दिखाकर सेठ से ऊंट को बैठाने के लिए कहा और उसने सेठ की समस्त धन-संपत्ति हड़प ली। जाते-जाते वह सेठ की गर्दन भी काट गया। रात्रि में उस निर्जन वन में अपने बच्चे को साथ लिए सेठानी विलाप करती हुई रामदेवजी को पुकारने लगी।अबला की पुकार सुनकर रामदेवजी अपने नीले घोड़े पर सवार होकर तत्काल वहां आ पहुंचे। आते ही रामदेवजी ने उस अबला से अपने पति का कटा हुआ सर गर्दन से जोड़ने को कहा। सेठानी ने जब ऐसा किया तो सर जुड़ गया और दलाजी जीवित हो गया। बाबा का यह चमत्कार देख दोनों सेठ-सेठानी बाबा के चरणों में गिर पड़े। बाबा उनको जीवन का आशीर्वाद देकर अंतर्ध्यान हो गए। बस उसी स्थल पर दलाजी ने बाबा का एक भव्य मंदिर बनवाया। कहते हैं कि यह बाबा की माया थी।

5. रामदेवजी ने सिरोही निवासी एक अंधे साधु को दी आंखे :

एक अंधा साधु सिरोही से कुछ अन्य लोगों के साथ रुणिचा में बाबा के दर्शन करने के लिए निकला। सभी पैदल चलकर रुणिचा आ रहे थे। रास्ते में थक जाने के कारण अंधे साधु के साथ सभी लोग एक गांव में पहुंचकर रात्रि विश्राम करने के लिए रुक गए। आधी रात को जागकर सभी लोग अंधे साधु को वहीं छोड़कर चले गए।
जब अंधा साधु जागा तो वहां पर कोई नहीं मिला और इधर-उधर भटकने के पश्चात वह एक खेजड़ी के पास बैठकर रोने लगा। उसे अपने अंधेपन पर इतना दुःख हुआ जितना और कभी नहीं हुआ था। रामदेवजी अपने भक्त के दुःख से द्रवीभूत हो उठे और वे तुरंत ही उसके पास पहुंचे। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखकर उसके नेत्र खोल दिए और उसे दर्शन दिए। उस दिन के बाद वह साधु वहीं रहने लगा। उस खेजड़ी के पास रामदेवजी के चरण (पघलिए) स्थापित करके उनकी पूजा किया करता था। कहा जाता है वहीं पर उस साधु ने समाधि ली थी।

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