Baba Ramdev Mela लोक देवता पीर बाबा की जीवनी

 

रामदेव जी राजस्थान के एक लोक देवता हैं। 15वी. शताब्दी के आरम्भ ‘में भारत में लूट खसोट, छुआछूत, हिंदू-मुस्लिम झगडों आदि के कारण स्थितियाँ बड़ी अराजक बनी हुई थीं। जिन्होंने लोक में व्याप्त अत्याचार, वैर-द्वेष, छुआछूत का विरोध कर अछूतोद्धार का सफल आन्दोलन चलाया। भारत में पीर, बाबा और संतों के बहुत सारे स्थान हैं लेकिन ‘पीरों के पीर रामापीर, बाबाओं के बाबा रामदेव बाबा’ को सभी भक्त बाबारी कहते हैं। उनसे बड़ा संत इस अखंड भारत की भूमी पर दूसरा कोई नहीं।

बाबा रामदेव का जन्म

श्री रामदेव जी का जन्म संवत् 1409 में भाद्र मास की दूज को राजा अजमल जी के घर हुआ । उस समय सभी मंदिरों में घंटियां बजने लगीं, तेज प्रकाश से सारा नगर जगमगाने लगा । महल में जितना भी पानी था वह दूध में बदल गया, महल के मुख्य द्वार से लेकर पालने तक कुम कुम के पैरों के पदचिन्ह बन गए, महल के मंदिर में रखा संख स्वत: बज उठा । उसी समय राजा अजमल जी को भगवान द्वारकानाथ के दिये हुए वचन याद आये और एक बार पुन: द्वारकानाथ की जय बोली

रुणिचा की स्थापना

संवत् 1425 में रामदेव जी महाराज ने पोकरण से 12 कि०मी० उत्तर दिशा में एक गांव की स्थापना की जिसका नाम रूणिचा रखा । लोग आकर रूणिचा में बसने लगे । रूणिचा गांव बड़ा सुन्दर और रमणीय बन गया । भगवान रामदेव जी अतिथियों की सेवा में ही अपना धर्म समझते थे । अंधे, लूले-लंगड़े, कोढ़ी व दुखियों को हमेशा हृदय से लगाकर रखते थे । वर्तमान में रूणिचा को रामदेवरा के नाम से पुकारा जाता है ।

बाबा रामदेव की समाधी

कर्मस्थली रामदेवरा (रूणीचा) को बनाया । भादवा सुदी 11 वि.सं. संवत् 1442 को रामदेव जी ने अपने हाथ से नारियल (श्रीफल) लेकर अपने सभी देवताओं व वरिष्‍ठों को प्रणाम कर समाधी ली । सभी ने मिलकर पुष्‍पमाला चढ़ाकर रामदेव जी का हार्दिक तन, मन व श्रद्धा से अन्तिम पूजन किया । इस समय रामदेवजी ने अपने भक्तों को शान्ति एवं अमन से जीवन व्‍यतित करने का संदेश देते हुए जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्‍त करने हेतु प्रेरित किया । समाधी स्‍थल पर खड़े होकर अपने अन्तिम उपदेश देते हुए बताया कि प्रति माह की शुक्ल पक्ष की दूज को पूजा पाठ, भजन कीर्तन करके पर्वोत्सव मनाना, जम्‍मा (रात्रि जागरण) करना ।

बाबा रामदेव का मंदिर

रामदेवरा में स्थित रामदेवजी के वर्तमान मंदिर का निर्माण सन् 1939 में बीकानेर के महाराजा श्री गंगासिंह जी ने करवाया था । इस पर उस समय 57 हजार रुपये की लागत आई थी । इस विशाल मंदिर की ऐतिहासिकता, पवित्रता और भव्यता देखते ही बनती है । देश में ऐसे अनूठे मंदिर कम ही हैं जो हिन्दू मुसलमान दोनों की आस्था के केन्द्र बिन्दु हैं । बाबा रामदेव का मंदिर इस दृष्टि से भी अनुपम है कि वहां बाबा रामदेव की मूर्ति भी है और मजार भी । यह मंदिर इस नजरिये से भी हजारों श्रद्धालुओं को आकृष्ट करता है कि बाबा के पवित्रा राम सरोवर में स्नान से अनेक चर्मरोगों से मुक्ति मिलती है । इन्हीं रामसा पीर का वर्णन लोकगीतों में ‘‘आँध्यां ने आख्यां देवे म्हारा रामसापीर’’ कह कर किया जाता है ।

रामदेवरा: दार्शनिक स्थल

  • बाबा रामदेव समाधी
  • रामसरोवर
  • परचा बावड़ी
  • डाली बाई का कंगन
  • पालना झूलना
  • रूणीचा कुआ (राणीसा का कुआ)
  • डाली बाई की जाल
  • पंच पीपली
  • गुरु बालीनाथ जी का धूणा
  • भैरव राक्षस गुफा
  • श्री पार्श्वनाथ जैन मंदिर
  • छतरियां ( सतीयो की देवली )
  • पोकरण
  • पोकरण फोर्ट
  • कैलाश टेकरी
  • शक्ति स्थल
  • गुरूद्वारा

बाबा रामदेव जी की चमत्कार-लीला

एक दिन रामदेव जी महल में बैठे हुए थे उस समय रामदेव जी ५ वर्ष के थे । एक घुड़सवार को देखकर रामदेव जी ने बाल हठ किया कि मैं भी घोड़े पर बैठुंगा । रामदेव जी को मनाने के लिये माता ने खूब जत्न किये पीने के लिये दूध, खेलने कि लिये हाथी-घोड़े उँट आदि के खिलौने सामने रखे किन्तु अपने बाल हठ को नहीं छोड़ा । माता ने दासी को भेजकर राजघराने के दर्जी को बुलाया और समझाया कि कुंवर रामदेव के लिये कपड़ों का सुन्दर घोड़ा बनाकर लाओ उस पर लीला याने हरे कपड़े का झूल लगाकर लाना ।

बाबा रामदेव का विवाह

जब बाबा रामदेव जी ने जन्म लिया था उस समय रूक्मणी को वचन देकर आये थे कि मैं तेरे साथ विवाह रचाउंगा । संवत् 1426 में अमर कोट के ठाकुर दल जी सोढ़ की पुत्री नैतलदे के साथ श्री रामदेव जी का विवाह हुआ ।

दूज (बीज) व्रत

ॐ नमो भगवते नेतल नाथाय, सकल रोग हराय सर्व सम्पति कराय ।

मम मनाभिलाशितं देहि देहि कार्यम साधय, ॐ नमो रामदेवाय स्वाहा ।।

बाबा रामदेवजी ने अपने अनुयायियों को दो व्रत रखने का संदेश दिया । वर्ष के प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की दूज व एकादशी बाबा की द्रष्टि में उपवास के लिए अति उत्तम थी जिसका एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी जान पड़ता है असी कारण से बाबा के अनुयायी/भक्‍त आज भी इन दो तिथियों पर पूर्ण श्रद्धा व विशवास के साथ व्रत करते हैं |

श्रीरामदेव आरती

जय अजमल लाला प्रभु, जय अजमल लाला ।।

भक्‍त काज कलयुग में लीनो अवतारा, जय अजमल लाल ।।

अश्‍वनकी अवसारी शोभीत केशरीया जामा ।

शीस तुर्रा हद शोभीत हाथ लीया भाला ।। जय

डुब्‍त जहाज तीराई भैरव दैत्‍य मारा ।

कृष्‍णकला भयभजन राम रूणेचा वाला ।। जय

अंधन को प्रभु नेत्र देत है सु संपती माया ।

कानन कुंडल झील मील गल पुष्‍पनमाल ।। जय

कोढी जय करूणा कर आवे होंय दुखीत काया ।

शरणागत प्रभु तोरी भक्‍तन सुन दाया ।। जय

आरती रामदेव जी की नर नारी गावे ।

कटे पाप जन्‍म-जन्‍म के मोंक्षां पद पावे ।। जय

जय अजमल लाला प्रभु, जय अजमल लाला ।

भक्‍त काज कलयुग में लीनो अवतारा, जय अजमल लाल ।।

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