बकरीद कब है 2017 बकरीद क्यों मनाई जाती हैं बकरीद के इतिहास की कहानी

बकरीद कब है 2017 ? – इस साल बकरीद 1 सितम्बर शुक्रवार शाम से 2 सितम्बर 2017 शनिवार शाम तक मनाया जायेगा | बकरीद को इस्लाम धर्म में बहुत ही पवित्र त्योहार माना जाता है। इस्लाम में एक साल में दो तरह की ईद मनाई जाती है। एक ईद जिसे मीठी ईद कहा जाता है और दूसरी बकरीद। एक ईद समाज में प्रेम की मिठास घोलने का संदेश देती है। तो वहीं दूसरी ईद अपने कर्तव्य के लिए जागरूक रहने का सबक सिखाती है। ईद-उल-ज़ुहा या बकरीद का दिन फर्ज़-ए-कुर्बान का दिन होता हैं। आमतौर पर मुस्लिम समाज में बकरे को पाला जाता है और अपनी हैसियत के अनुसार उसकी देख रेख की जाती हैं और जब वह बड़ा हो जाता हैं उसे बकरीद के दिन अल्लाह के लिए कुर्बान कर दिया जाता हैं जिसे फर्ज-ए-कुर्बान कहा जाता हैं।

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बकरीद (ईद-उल-जुहा ) क्यों मनाई जाती हैं ?

पैगम्बर हजरत महोम्मद को अल्लाह ने हुक्म दिया था कि अपनी सबसे प्यारी चीज को मेरे लिए कुर्बान कर दो। लेकिन पैगम्बर साहब को अपना इकलौता बेटा इस्माइल सबसे अधिक प्रिय था। खुदा के कहने पर उसने अपने प्रिय बेटे इस्माइल को कुर्बान करने का मन बना लिया। इस बात से इस्माइल भी खुश था वह अल्लाह के लिए कुर्बानी देने को तैयार हो गया । बकरीद के दिन जैसे ही कुर्बानी का समय आया तब इस्माइल की जगह एक मेमना कुर्बान हो गया। अल्लाह ने इस्माइल को बचा लिया और पैगम्बर साहब की कुर्बानी कबूल कर ली। तभी से हर साल पैगम्बर साहब द्वारा दी गई कुर्बानी की याद में बकरीद मनाई जाने लगी।बकरीद पर अल्लाह को बकरे की कुर्बानी दी जाती है।

Eid al-Adha 2017 date in India

Saudi Arabia’s High Judicial Court (HJC) has announced that, based on confirmed sightings of the new moon crescent, the first day of the Eid al-Adha Muslim festival will be Friday, September 1, 2017. The moon was sighted on August 22 leading to this date for Eid al-Adha. However, for India and Pakistan, the festival falls a day later. Therefore, Eid al-Adha 2017 date in India is September 2.

बकरीद की कहानी

ईद-उल-ज़ुहा या बकरीद का दिन कुर्बान का दिन होता हैं। हम सभी जानते हैं कि बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती हैं। मुस्लिम समाज में बकरे को पाला जाता है और अपने बूते के अनुसार उसकी देख रेख की जाती हैं और जब वो बड़ा हो जाता हैं तो उसे बकरीद के दिन अल्लाह के लिए कुर्बान कर दिया जाता हैं जिसे फर्ज-ए-कुर्बान कहा जाता हैं |

ईद,बकरीद का इतिहास : The History of Bakrid

ईद-उल-फितर : आज देशभर में ईद मनाई जा रही है। ईद का त्यौहार मुस्लिम समाज के लोगों के लिए पाक त्यौहार होता है। इस त्यौहार को मुस्लिम समाज के लोग बड़ी ही धूम-धाम से बनाते हैं। इस्लामिक कैलेण्डर के अनुसार एक साल में दो ईद आती हैं, ईद-उल-जुहा और ईद-उल-फितर। ईद-उल-फितर को मीठी ईद भी कहा जाता है। वहीं ईद-उल-जुहा को बकरीद के नाम से जाना जाता है। रमजान के 30वें रोजे के चांद को देखकर मीठी ईद या ईद-उल-फितर मनाई जाती है। ईद को रमजान महीने के आखिरी दिन मनाया जाता है।ईद के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि 624 ईस्वी में पहली ईद-उल-फितर या मीठी ईद मनाई गई थी। ईद पैगम्बर हजरत मुहम्मद के युद्ध में विजय प्राप्त करने की खुशी में मनाई गई थी। तभी से ईद मनाने की परंपरा चली आ रही है।

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बकरीद : इसके अलावा ईद-उल-जुहा भी मनाई जाती है। इस ईद को बकरीद भी कहा जाता है। अरबी भाषा में इसका मतलब कुर्बानी होता है। मुस्लिम धर्म के लोगों के लिए यह त्यौहार बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस त्यौहार को रमजान के पाक महीने के खत्म होने हो जाने के 70 दिनों के बाद मनाया जाता है।इस ईद के बारे में कहा जाता हैं की इस दिन हजरत इब्राहिम साहब अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो गए थे। ऐसा कहा जाता है कि अल्लाह ने उनके बेटे को जीवनदान दे दिया। तभी से हजरत इब्राहिम के पुत्र की याद में ईद का पर्व मनाया जाता है। और अल्लाह के लिए बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती हैं।

ईद विक्की : Eid Wiki

ईद उल-फितर मुस्लमान रमज़ान उल-मुबारक के महीने के बाद एक मज़हबी ख़ुशी का त्योंहार  मनाते हैं जिसे ईद उल-फ़ित्र कहा जाता है। ईद उल-फ़ित्र इस्लामी कैलेण्डर के दसवें महीने के पहले दिन मनाया जाता है। इसलामी कैलंडर के सभी महीनों की तरह यह भी नए चाँद के दिखने पर शुरू होता है। मुसलमानों का त्योहार ईद मूल रूप से भाईचारे को बढ़ावा देने वाला त्योहार है। इस त्योहार को सभी आपस में मिल के मनाते है और खुदा से सुख-शांति और तरक्की के लिए दुआएं मांगते हैं। पूरे विश्व में ईद की खुशी पूरे हर्षोल्लास से मनाई जाती है

जानिए पैगंबर मोहमम्द साहब की कुर्बानी की कहानी : बकरीद

इस कहानी के अनुसार एक बार इब्राहीम अलैय सलाम नामक एक व्यक्ति था , जिन्हें सपने में अल्लाह का आदेश हुआ कि वे अपने प्यारे बेटे इस्माइल को अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें। यह इब्राहीम अलैय सलाम के लिए एक परीक्षा थी ,।लेकिन अल्लाह का हुक्म ठुकराना अपने धर्म की तौहीन करने के समान था, जो इब्राहीम अलैय सलाम को कभी भी कुबूल ना था। इसलिए उन्होंने सिर्फ अल्लाह के हुक्म को पूरा करने का निर्णय बनाया और अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो गए।लेकिन अल्लाह ने अपने बंदे पर रहम की और वह अपने बंदे के दिल के हाल को बाखूबी जानता है। उसने स्वयं ऐसा रास्ता खोज निकाला था जिससे उसके बंदे को दर्द ना हो। जैसे ही इब्राहीम अलैय सलाम छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान करने लगे,तभी अल्लाह ने इब्राहीम के बेटे को छुरी के निचे से हटाकर उसकी जगह मेमने को खड़ा कर दिया  और इब्राहीम अलैय सलाम को खुशखबरी सुनाई कि अल्लाह ने आपकी कुर्बानी कुबूल कर ली है और अल्लाह आपकी कुर्बानी से राजी है।

 

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