चित्तौड़गढ़ दुर्ग का निर्माण कार्य ऐतिहासिकता रानी पद्मिनी का जौहर की सामान्य जानकारी

चित्तौड़गढ़ दुर्ग भारत का सबसे विशालतम दुर्ग में से एक है। यह राजस्थान राज्य के जिला चित्तौड़गढ़ में स्थित है। यह एक विश्व विरासत का विभिन्न भाग है। पहले के जमाने में चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी के रूप में जानी जाती थी। यह प्रसिद्ध किला इतिहास की सबसे खूनी भयंकर लड़ाईयों का गवाह है। इसने किले में तीन महान आख्यान और पराक्रम के सर्वाधिक वीरोचित कार्य देखे गये हैं जो आज भी स्थानीय गायकों द्वारा गाए जाते हैं। चित्तौड़ के दुर्ग को 2013 में युनेस्को ने विश्व विरासत स्थल घोषित किया है |

  • ऐतिहासिकता तथा निर्माण
  • रणनीति के दृष्टिकोण से चित्तौड़गढ़ का राजधानी के रूप में महत्व
  • गढ़ तो चित्तौड़गढ़ और सब गढ़ैया
  • पाडन पोल
  • रावत बाघसिंह का स्मारक
  • भैरव पोल (भैरों पोल)
  • जयमल व कल्ला की छतरियाँ
  • हनुमान पोल
  • गणेश पोल
  • जोड़ला पोल
  • लक्ष्मण पोल
  • राम पोल
  • पत्ता का स्मारक
  • कुकड़ेश्वर का कुण्ड तथा कुकड़ेश्वर का मंदिर
  • हिंगलू आहाड़ा के महल तथा रत्नेश्वर तालाब
  • लाखोटा की बारी
  • जैन कीर्ति स्तम्भ
  • महावीर स्वामी का मंदिर
  • नीलकंठ महादेव का मंदिर
  • सूरजपोल तथा चूड़ावत साँई दास का स्मारक
  • अद्बद्जी का मंदिर
  • राजटीला तथा चत्रंग तालाब
  • चित्तौड़ी बूर्ज व मोहर मगरी

चित्तौड़गढ़ दुर्ग की ऐतिहासिकता The historicity of Chittorgarh Fort

चित्तौड़गढ़ राजस्थान के शूरवीरों का शहर है जो एक ऊँची पहाड़ी पर बने दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है। चित्तौड़गढ़ की प्राचीनता का पता लगाना बहुत कठिन है कहा जाता है कि महाभारत काल में महाबली भीम ने अमरत्व के रहस्यों को समझने के लिए इस स्थान का भरण किया था | और एक पंडित को अपना गुरु बनाया किंतु जब समस्त प्रक्रिया को पूरी करने से पहले ही अधीर होकर वह अपना लक्ष्य नहीं पा सका और प्रचंड गुस्से में आकर उसने अपना पांव जोर से जमीन पर मारा जिससे वहां पानी का स्रोत फूट पड़ा | पानी का यह कुंड भीम ताल के नाम से जान जाता है। बाद में यह स्थान मौर्य अथवा मूरी राजपूतों के अधीन आ गया था | बाद में राजधानी को उदयपुर ले जाने से पहले 1568 तक चित्तौड़गढ़ मेवाड़ की राजधानी हो गयी । यहां पर रोड वंशी राजपूतों ने बहुत समय राज किया यह माना जाता है कि रोड वंश के महान संस्थापक बप्पा रावल ने 8वीं शताब्दी के मध्य में अंतिम सोलंकी राजकुमारी से विवाह करने पर चित्तौड़ को दहेज के एक भाग के रूप में प्राप्त किया था | बाद में उसके वंशजों ने मेवाड़ पर शासन किया जो 16वीं शताब्दी तक गुजरात से अजमेर तक फैल चुका था।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग का निर्माण Construction of Chittorgarh fort

चित्तौड़गढ़ दुर्ग का निर्माण मौर्यवंशीय राजा चित्रांगद ने सातवीं शताब्दी में करवाया था यह इतिहासकारों का मानना है | और इसे अपने नाम पर चित्रकूट के रूप में बसाया। मेवाड़ के प्राचीन सिक्कों पर एक तरफ चित्रकूट नाम अंकित मिलता है। बाद में यह चित्तौड़ कहा जाने लगा। सन् 738 में गुहिलवंशी रोड राजा बाप्पा रावल ने राजपूताने पर राज्य करने वाले मौर्यवंश के अंतिम शासक मानमोरी को हराकर यह किला अपने अधिकार में कर लिया। फिर मालवा के परमार राजा मुंज ने इसे गुहिलवंशियों से छीनकर अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार 9 वी 10 वीं शताब्दी में इस पर परमारों का आधिपत्य रहा। सन् 1133 में गुजरात के सोलंकी राजा जयसिंह (सिद्धराज) ने यशोवर्मन को हराकर परमारों से मालवा छीन लिया, जिसके कारण चित्तौड़गढ़ का दुर्ग भी सोलंकियों के अधिकार में आ गया। तदनंतर जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल के भतीजे अजयपाल को परास्त कर मेवाड़ के राजा सामंत सिंह ने सन् 1174 के आसपास पुनः गुहिलवंशियों का आधिपत्य स्थापित कर दिया। सन् 1213 से 1252 तक नागदा के पतन के बाद यहाँ जेत्रसिंह ने इसे राजधानी बनाकर शासन चलाया। सन् 1303 में यहाँ के रावल रतनसिंह की अल्लाउद्दीन खिलजी से लड़ाई हुई। लड़ाई चितौड़ का प्रथम शाका के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस लड़ाई में अलाउद्दीन खिलजी की विजय हुई और उसने अपने पुत्र खिज्र खाँ को यह राज्य सौंप दिया। खिज्र खाँ ने वापसी पर चित्तौड़ का राजकाज कान्हादेव के भाई मालदेव को सौंप दिया।

बाप्पा रावल रोड़वंशी के वंशल राजा हमीर ने पुनः मालदेव से यह किला हस्तगत किया। हमीर बड़ा पराक्रमी और दूरदर्शी था। उसने यहाँ 50 वर्षों तक बड़ी योग्यता से शासन करते हुए अपने राज्य का विस्तार किया। उसी के प्रयत्नों से चित्तौड़ का गौरव पुनः स्थापित हो सका। और रोड राज्य द्वारा स्तापित किया सन् 1538 में चित्तौड़ पर गुजरात के बहादुरशाह ने आक्रमण कर दिया। इस युद्ध को मेवाड़ का दूसरा शाका के रूप में जाना जाता है। सन् 1567 में मेवाड़ का तीसरा शाका हुआ, जिसमें अकबर ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी थी। ये सब मुस्लिम आक्रमण चित्तौड़गढ़ की सांस्कृतिक विनाश का मुख्य कारणों में से एक है। तीसरे शाके के बाद ही सन् 1559 में महाराणा उदयसिंह ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ से हटाकर अरावली के मध्य पिछोला झील के पास स्थापित कर दी, जो आज उदयपुर के नाम से जाना जाता है।

रणनीति के दृष्टिकोण से चित्तौड़गढ़ का राजधानी के रूप में महत्व

चित्तौड़गढ़ का किला राजपूताने में हमेशा से ही विशेष महत्व रखता है। इसे मेवाड़ के गुहिलवंशियों की पहली राजधानी के रूप में सम्मान प्राप्त है, जिसे उन्होंने मौर्यवंश के अंतिम शासक मानमोनी को हराकर अपने अधिकार में कर लिया था। यह दुर्ग अरावली की पहाड़ी पर उत्तर से दक्षिण की ओर लंबाई में बना है, जिसमें बीच में समतल भूमि आ जाने के कारण एक कुंड, तालाब, मंदिर, महल आदि सभी एक निश्चित निर्माण-योजना के तहत समय-समय पर बनते रहे हैं। कुछ जलाशय तो ऐसे हैं जो निरन्तर जलापूर्ति के साधन के रूप में काम आते रहे हैं। इस गढ़ के सम्बन्ध में प्रचलित एक कहावत है जो इस दुर्ग के महत्व को बताता है।

गढ़ तो चित्तौड़गढ़ और बाकी सब गढ़ैया

वास्तव में इस दुर्ग का निर्माण अभी भी हमें विस्मय व रोमांच से भर देता है। लेकिन रणनीतिक दृष्टिकोण से देखने पर पता चलता है कि अपने भौगोलिक कारणों से यह दुर्ग युद्ध के लिए रणथंभौर और कुभलगढ़ जैसे दुर्गों की तरह उपयुक्त नहीं था। नि:संदेह किला सुदृढ़ था। पहाड़ी के किनारे-किनारे उदग्र खड़े चट्टानों की पंक्ति थी जिसके ऊपर एक ऊँचा और सुदृढ़ प्रकार बना हुआ था। साथ ही साथ दुर्ग में प्रवेश करने के लिए लगातार सात दरवाजे कुछ अन्तराल पर बनाए गये थे। इन सब कारणों से किले में प्रवेश कर पाना तो शत्रुओं के लिए बहुत ही मुश्किल था। परन्तु यह विस्तृत मैदान के बीच एक लम्बी पहाड़ी पर बना है जो अन्य पर्वत श्रेणियों से पृथक हो गया है। अतएव शत्रुओं द्वारा उसका घेरा डालकर किले में इस्तेमाल होने वाला रसद पहुँचाना सुगमता से रोक दिया जाता था। इस दुर्ग का जब-जब घेरा डाला गया तब-तब गढ़ में भोजन-सामग्री विद्यमान रहने तक ही गढ़ सुरक्षित रहा। भोजनादि सामग्री खत्म होते ही राजपूतों को विवश होकर युद्ध के लिए किले का द्वार खोल देना पड़ता था। लेकिन प्रायः शत्रुओं की बड़ी सेना होने की स्थिति में उन्हें हार का सामना करना पड़ता था। इस प्रकार हम देखते हैं कि चित्तौड़गढ़ का राजधानी के रूप में चयन रणनीति की दृष्टि से उचित नहीं था और यही कारण था कि महाराणा उदय सिंह ने उदयपुर को अपनी राजधानी बनाई, जो चारों तरफ पर्वतों से घिरे होने के कारण ज्यादा सुरक्षित था।

चित्तौड़गढ़ किले का पाडन पोल प्रवेश द्वार Paddole Poll entrance of Chittorgarh Fort

चित्तौड़गढ़ किले का प्रथम प्रवेश द्वार है। कहा जाता है | कि एक बार युद्ध में खून की नदी बहनें के कारण एक पाड़ा (भैंसा) बहता-बहता पाड़न पोल तक आ गया था। इसी कारण इस द्वार को पाडन पोल कहा जाता है।

चित्तौड़गढ़ किले में रावत बाघसिंह का स्मारक

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के प्रथम द्वार (पाडन पोल) के बाहर के चबूतरे पर ही रावत बाघसिंह का स्मारक बना हुआ है। महाराणा विक्रमादित्य के राज्यकाल में, सन् 1535 में यहाँ की अव्यवस्था से प्रेरित हो गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। उस समय बालक होने के कारण हाड़ी रानी कर्मवती ने विक्रमादित्य व उदयसिंह को बूंदी भेजकर मेवाड़ के सरदारों को किले की रक्षा का कार्यभार सौंप दिया। प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह ने मेवाड़ का राज्य चिन्ह धारण कर महाराणा विक्रमादित्य का प्रतिनिधित्व किया तथा लड़ता हुआ इसी दरवाजे के पास वीरगति को प्राप्त हुआ। उसी वीर की स्मृति में यह स्मारक बनाया गया है।

चित्तौड़गढ़ किले का भैरव पोल (भैरों पोल)

पाडन पोल से उत्तर की तरफ चलने पर दूसरा दरवाजा आता है | जिसे भैरव पोल के नाम से जाना जाता है। इसका नाम देसूरी के सोलंकी भैरोंदास के नाम पर रखा गया है | जो सन् 1534 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से युद्ध में मारे गया था । मूल द्वार टूट जाने के कारण महाराणा फतहसिंह जी ने इसका पुनर्निर्माण कराया था।

चित्तौड़गढ़ किले में जयमल पता व कल्ला की छतरियाँ

भैरव पोल के दाहिनी ओर दो बड़ी बड़ी छतरियाँ बनी हुई है। पहली छतरी चार स्तम्भों वाली जो छत्री प्रसिद्ध राठौड़ जैमल( जयमल बदनोर के राजा) के कुटुंबी कल्ला की है तथा दूसरी छतरी छः स्तम्भों वाली स्वयं जैमल की है |इन छत्रियो के पास ही दोनों राठौड़ मारे गये थे। सन् 1567 में जब बादशाह अकबर ने चित्तौड़गढ़ परआक्रमण किया उस समय सीसोदिया पता तथा मेड़तिया राठौर जैमल दोनों महाराणा उदयसिंह की अनुपस्थिति में दूर्ग के रक्षक नियुक्त किय गये थे। इसी तीसरे शाके की लड़ाई के दिनों में एक रात्रि जब जैमल एक टूटी दीवार की मरम्मत करा रहे थे | उस समय अकबर की गोली से उनकी एक टांग बेकार हो गयी। इस युद्ध में लंगड़े जैमल को कल्ला ने अपने कंधों पर बिठाकर दूसरे दिन के युद्ध में उतारा था। उन दोनों ने मिलकर शत्रु सेना पर कहर बरपाया दिया। अन्त में दोनों भिन्न-भिन्न जगहों पर वीरगति को प्राप्त हो गये। ये दोनों छतरियाँ उन्हीं की गौरवगाथाओं की याद दिलाती हैं।

चित्तौड़गढ़ किले का हनुमान पोल

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के तृतीय प्रवेश द्वार को हनुमान पोल कहा जाता है। क्योंकि इस पोल के पास ही हनुमान जी का मंदिर है। हनुमान जी की प्रतिमा चमत्कारिक एवं दर्शनीय बताई जाती हैं।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग का गणेश पोल

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में हनुमान पोल से कुछ आगे बढ़कर दक्षिण की ओर मुड़ने पर गणेश पोल आता है | जो दुर्ग का चौथा द्वार है। इसके पास ही (गजानंद) गणपति जी का मंदिर है।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग का जोड़ला पोल

चित्तौड़गढ़ दुर्ग का पाँचवां प्रवेश द्वार है और यह छठे द्वार के बिल्कुल पास होने के कारण इसे जोड़ला पोल कहा जाता है।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग का लक्ष्मण पोल

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के इस 6वे द्वार के पास ही एक छोटा सा लक्ष्मण जी का मंदिर है जिसके कारण इसका नाम लक्ष्मण पोल है।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग का राम पोल

लक्ष्मण पोल से आगे बढ़ने पर एक पश्चिमाभिमुख प्रवेश द्वार मिलता है | प्रवेश द्वार से होकर किले के अन्दर प्रवेश कर सकते हैं। यह दरवाजा किले का सातवां तथा अन्तिम प्रवेश द्वार है। इस दरवाजे के बाद चढ़ाई समाप्त हो जाती है। इसके निकट ही महाराणाओं के पूर्वज माने जाने वाले सूर्यवंशी भगवान श्री रामचन्द्र जी का मंदिर है।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में पत्ता का स्मारक

रामपोल में प्रवेश करते ही सामने की तरफ लगभग 50 कदम की दूरी पर स्थित चबूतरे पर सीसोदिया पत्ता के स्मारक का पत्थर है। आमेर के रावतों के पूर्वज पत्ता सन् 1568 में अकबर की सेना से लड़ते हुए इसी स्थान पर वीरगति को प्राप्त हुए थे। कहा जाता है कि युद्ध भूमि में एक पागल हाथी ने युद्धरत पत्ता को सूंड में पकड़कर जमीन पर पटक दिया जिससे उनकी मृत्यु हो गयी।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुकड़ेश्वर का कुण्ड तथा कुकड़ेश्वर का मंदिर

अंतिम प्रवेश दवार रामपोल से प्रवेश करने के बाद सड़क उत्तर की ओर मुड़ती है। उससे थोड़ी ही दूर पर दाहिनी ओर कुकड़ेश्वर का कुंड है, जिसके ऊपर के भाग में कुकड़ेश्वर का मंदिर है। ये दोनों रचनाएं महाभारत कालीन है तथा पाण्डव पुत्र भीम से जुड़ी हैं।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में हिंगलू आहाड़ा के महल

कुकड़ेश्वर मंदिर से आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ सड़क से कुछ दूर हिंगलू आहाड़ा के महल हैं। डूंगरपुर तथा बांसवाड़े के राजा भी आहाड़ा कहलाते है । हिंगलू, डूंगरपुर का आहाड़ा सरदार था और इन महलों में रहता था जिससे ये महल हिंगलू आहाड़ा के महल कहलाये। बूंदीवालों का हाड़ा के रूप में नाम प्रसिद्ध हो जाने से लोग इन महलों कोहिंगलू हाड़ा के महल कहने लगे।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में रत्नेश्वर तालाब

इस महल में महाराणा रत्नसिंह रहते थे। इसके पास बना तालाब महाराणा ने खुद बनवाया था, जो रत्नेश्वर का कुंड (रत्नेश्वर तालाब) के नाम से जानी जाती है। तालाब के पश्चिमी किनारे पर रत्नेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में लाखोटा की बारी

रत्नेश्वर कुंड से थोड़ी दूर पर पहाड़ी के पूर्वी किनारे के समीप लाखोटा की बारी है। यह एक बहुत छोटा सा दरवाजा है, इस दरवाजे से दुर्ग के नीचे जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी द्वार के पास अकबर की गोली से जयमल पैर से लंगड़ा हो गया था।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में जैन कीर्ति स्तम्भ

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में लाखोटा की बारी से राज टीले तक सड़क सीधी दक्षिण में मुड़ जाती हैउसी स्थान पर बायीं ओर 75 फीट ऊँचा सात मंजिलों वाला एक स्तम्भ बना है जिसका निर्माण चौदहवीं शताब्दी में दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के बघेरवाल महाजन सा नांय के पुत्र जीजा ने करवाया था। यह स्तम्भ नीचे से 30 फुट तथा ऊपरी हिस्से पर 15 फुट चौड़ा है तथा ऊपर की ओर जाने के लिए तंग नाल बनी हुई हैं।

चित्तौड़गढ़ जैन कीर्ति स्तम्भ वास्तव में आदिनाथ का स्मारक है, जिसके चारों पार्श्व पर आदिनाथ की ५ फुट ऊँची दिगम्बर (नग्न) जैन मूर्ति खड़ी है तथा बाकी के भाग पर छोटी-छोटी जैन मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। इस स्तम्भ के ऊपर की छत्री बिजली गिरने से टूट गई थी तथा इससे इमारत को बड़ी हानि पहुँची थी। महाराणा फतह सिंह जी ने इस स्तम्भ की मरम्मत करवाई।

महावीर स्वामी का मंदिर

जैन कीर्ति स्तम्भ के निकट ही महावीर स्वामी का मन्दिर है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार महाराणा कुम्भा के राज्यकाल में ओसवाल महाजन गुणराज ने करवाया थ। हाल ही में जीर्ण-शीर्ण अवस्था प्राप्त इस मंदिर का जीर्णोद्धार पुरातत्व विभाग ने किया है।

नीलकंठ महादेव का मंदिर

महावीर स्वामी के मंदिर से थोड़ा आगे बढ़ने पर नीकण्ठ महादेव का मंदिर आता है। कहा जाता है कि महादेव की इस विशाल मूर्ति को पाण्डव भीम अपने बाजूओं में बांधे रखते थे।

सूरजपोल तथा चूड़ावत साँई दास का स्मारक

नीलकंठ महादेव के मंदिर के बाद किले के पूरब की तरफ एक दरवाजा है, जो सूरज पोल के नाम से जाना जाता है। यहाँ से दुर्ग के नीचे मैदान में जाने के लिए एक रास्ता बना हुआ है। इस दरवाजे के पास ही एक चबूतरा बना है, जो संलूबर के चंडावत सरदार रावत साईदास जी का स्मारक है। वे सन् 1568 में अकबर की सेना के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।

अद्बद्जी का मंदिर

रावत साँईदास के स्मारक से दक्षिण की तरफ जाने पर दाहिनी ओर अद्बद् (अद्भुतजी) का मंदिर है, जिसे महाराणा रायमल ने सन् 1394 में बनवाया था। जीर्ण-शीर्ण अवस्था प्राप्त इस मंदिर की स्थापत्य कला दर्शनीय है। मंदिर में शिवलिंग है तथा उसके पीछे दीवार पर महादेव की विशाल त्रिमूर्ति है, जो देखने में समीधेश्वर मंदिर की प्रतिमा से मिलती है। अद्भुत प्रतिमा के कारण ही इस मंदिर को अद्बद् जी का मंदिर कहा जाता है।

राजटीला तथा चत्रंग तालाब

अद्बद्जी के मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर राजटीला नामक एक ऊँचा स्थान है। कहा जाता है कि यहीं पहले मौर्यवंशी शासक मान के महल थे। कुछ लोगों का मानना है कि प्राचीन काल में राजाओं का राज्याभिषेक इसी स्थान पर हुआ करता था। इस स्थान के पास से सड़क पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। सड़क के पश्चिमी सिरे के पास चित्रांगद मौर्य का निर्माण कराया हुआ तालाब है, जिसको चत्रंग कहते हैं। यहाँ से अनुमानतः पौने मील दक्षिण मं। चित्तौड़ की पहाड़ी समाप्त हो जाती है और उसके नीचे कुछ ही दूरी पर चित्तोड़ी नाम की एक छोटी पहाड़ी है।

चित्तौड़ी बूर्ज व मोहर मगरी

दुर्ग का अंतिम दक्षिणी बूर्ज चित्तौड़ी बूर्ज कहलाता है और इस बूर्ज के 150 फीट नीचे एक छोटी-सी पहाड़ी (मिट्टी का टीला) दिखाई पड़ती है। यह टीला कृत्रिम है और कहा जाता है कि सन् 1567 ई. में अकबर ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण किया था, तब अधिक उपयुक्त मोर्चा इसी स्थान को माना और उस मगरी पर मिट्टी डलवा कर उसे ऊँचा उठवाया, ताकि किले पर आक्रमण कर सके। प्रत्येक मजदूर को प्रत्येक मिट्टी की टोकरी हेतु एक-एक मोहर दी गई थी। अतः इसे मोहर मगरी कहा जाता है।

चित्तौड़गढ़ का दुर्ग

चित्तौड़गढ़ की निम्न बाते जो उसे मुख्य बनती है

  • बीका खोह
  • भाक्सी
  • घोड़े दौड़ाने के चौगान
  • पद्मिनी का महल
  • खातन रानी का महल
  • गोरा -बादल की घुमरें
  • राव रणमल की हवेली
  • कालिका माता का मंदिर
  • सूर्यकुण्ड (सूरज कुण्ड)
  • पत्ता तथा जैमल की हवेलियाँ
  • गौमुख कुण्ड
  • समिद्धेश्वर (समाधीश्वर) महादेव का मंदिर
  • महासती (जौहर स्थल)
  • कीर्तिस्तम्भ (विजय स्तम्भ, जय स्तम्भ)
  • जटाशंकर महादेव देवालय
  • कुम्भस्वामी (कुंभश्याम) का मंदिर
  • मीराँबाई का मंदिर
  • सतबीस देवलां
  • महाराणा कुंभा के महल
  • फतह प्रकाश
  • मोती बाजार
  • शृंगार चौरी (सिंगार चौरी)
  • महाराणा साँगा का देवरा
  • तुलजा भवानी का मंदिर
  • बनवीर की दीवार
  • नवलखा भण्डार
  • पातालेश्वर महादेव का मंदिर
  • भामाशाह की हवेली
  • आल्हा काबरा की हवेली
  • नगरी

चित्तौड़गढ़ की बीका खोह

चित्तौड़गढ़ के चत्रंग तालाब के पास बीका खोह नामक एक बूर्ज है। सन् 1537 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के समय लबरी खाँ फिरंगी ने सुरंग बनाकर किले की 45 हाथ लम्बी दीवार विस्फोट से उड़ा दी थी तथा दुर्ग रक्षा के लिए नियुक्त बूंदी के अर्जुन हाड़ा अपने 500 वीर सैनिकों सहित वीरगति को प्राप्त हुए थे।

चित्तौड़गढ़ की भाक्सी

चित्तौड़गढ़ के चत्रंग तालाब से थोड़ी दूर उत्तर की तरफ आगे बढ़ने पर दाहिनी ओर चारदीवारी से घिरा हुआ एक थोड़ा सा स्थान है | जिसे बादशाह की भाक्सी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस इमारत में जिसे महाराणा कुम्भा ने सन् 1433 ई. में बनवाया था जहा मालवा के सुल्तान महमूद को गिरफ्तार कर रखा था।

चित्तौड़गढ़ में घोड़े दौड़ाने के चौगान

भाक्सी से आगे पश्चिम की तरफ बूंदी रामपुरा तथा सलूंबर की हवेलियों के खण्डहर हैं। इसी के पूर्व में पुराना चौगान है जहाँ पहले सेना की कवायद हुआ करती थी। इसी को लोग घोड़े दौड़ाने का चौगान कहते है।

चित्तौड़गढ़ का पद्मिनी का महल

चौगान के निकट झील के किनारे रावल रत्नसिंह की रानी पद्मिनी का महल बना हुआ हैं। एक छोटा महल पानी के बीच में बना है, जो जनाना महल कहलाता है व किनारे के महल मरदाने महल कहलाते हैं। मरदाना महल मे एक कमरे में एक विशाल दपंण इस तरह से लगा है कि यहाँ से झील के मध्य बने जनाना महल की सीढियों पर खड़े किसी भी व्यक्ति का स्पष्ट प्रतिबिंब दपंण में नजर आता है, परंतु पीछे मुड़कर देखने पर सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति को नहीं देखा जा सकता। संभवतः अलाउद्दीन खिलजी ने यहीं खड़े होकर रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा था।

चित्तौड़गढ़ का खातन रानी का महल

पद्मिनी महल के तालाब के दक्षिणी किनारे पर एक पुराने महल का खण्डहर हैं, जो खातन रानी के महल कहलाता हैं। महाराणा क्षेत्र सिंह ने अपनी रुपवती उपपत्नी खातन रानी के लिए यह महल बनवाया था। इसी रानी से चाचा तथा मेरा नाम के दो पुत्र थे, जिसने सन् 1433 में महाराणा मोकल की हत्या कर दी थी।

चित्तौड़गढ़ किले का गोरा – बादल की घुमरें

पद्मिनी महल के दक्षिण-पूर्व में दो गुम्बदाकार इमारतें हैं| जिसे लोग गोरा और बादल महल के नाम में जानते हैं। गोरा महारानी पद्मिनी का चाचा था तथा बादल चचेरा भाई था। रावल रत्नसिंह को अलाउद्दीन के खेमे से निकालने के बाद युद्ध में पाडन पोल के पास गोरा वीरगति को प्राप्त हो गये और बादल युद्ध में 12 वर्ष की अल्पायु में ही मारा गया था। देखने में ये इमारत इतने पुराने नहीं मालूम होते ।

चित्तौड़गढ़ किले में राव रणमल की हवेली

गोरा बादल महल से आगे सड़क के पश्चिम की ओर एक विशाल हवेली के खण्डहर नजर आते हैं। इसको राव रणमल की हवेली कहते हैं। राव रणमल की बहन हंसाबाई से महाराणा लाखा का विवाह हुआ। महाराणा मोकल हँसा बाई से लाखा के पुत्र थे।

चित्तौड़गढ़ किले में कालिका माता का मंदिर

पद्मिनी के महलों के उत्तर में कालिका माता का सुन्दर विशाल महल है। इस मंदिर का निर्माण संभवतः 9वीं शताब्दी में मेवाड़ के गुहिलवंशीय राजाओं ने करवाया था। मूल रूप से यह मंदिर एक सूर्य मंदिर था।

चित्तौड़गढ़ किले में सूर्यकुण्ड (सूरज कुण्ड)

कालिका माता के मंदिर के पास विशाल कुण्ड बना हुआ है | जिसे सूरजकुण्ड कहा जाता है। इस कुण्ड के बारे में मान्यता यह है कि महाराणा को सूर्य भगवान का आशीर्वाद प्राप्त था तथा कुण्ड से प्रतिदिन प्रातः सफेद घोड़े पर सवार एक सशस्र योद्धा निकलता था जो महाराणा को युद्ध में सहायता देता था।

चित्तौड़गढ़ किले में पत्ता तथा जैमल की हवेलियाँ

गौमुख कुण्ड तथा कालिका माता के मंदिर के मध्य जैमल पत्ता के महल हैं | राठौड़ जैमल (जयमल) और सिसोदिया पत्ता चित्तौड़ की अंतिम शाका में अकबर की सेना के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये थे। महल के पूर्व में एक बड़ा तालाब है, जिसे जैमल-पत्ता का तालाब कहा जाता है।

चित्तौड़गढ़ किले का गौमुख कुण्ड

महासती स्थल के पास ही गौमुख कुण्ड है। यहाँ एक चट्टान के बने गौमुख से प्राकृतिक भूमिगत जल निरन्तर एक झरने के रूप में शिवलिंग पर गिरती रहती है। प्रथम दालान के द्वार के सामने विष्णु की एक विशाल मूर्ति खड़ी है। कुण्ड की धार्मिक महत्ता है। लोग इसे पवित्र तीर्थ के रूप में मानते हैं। कुण्ड के निकट ही उत्तरी किनारे पर महाराणा रायमल के समय का बना एक छोटा सा पार्श्व जैन मंदिर है गौमुख कुण्ड से कुछ दूर दो ताल हाथी कुण्ड तथा खातण बावड़ी है।

चित्तौड़गढ़ किले में समिद्धेश्वर (समाधीश्वर) महादेव का मंदिर

महादेव मंदिर का निर्माण मालवा के प्रसिद्ध राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में करवाया था। जिसके भीतरी और बाहरी भाग पर बहुत ही सुन्दर खुदाई का काम है। इसे त्रिभुवन नारायण का शिवालय और भोज का मंदिर भी कहा जाता था। इसका उल्लेख वहाँ के शिलालेखों में मिलता है। इसका जीर्णोद्धार महाराणा मोकल ने करवाया था, जिससे लोग इसे मोकलजी का मंदिर भी कहते हैं। मंदिर के निज मंदिर (गर्भगृह) नीचे के भाग में शिवलिंग है तथा पीछे की दीवार में शिव की विशाल आकार की त्रिमूर्ति बनी है। त्रिमूर्ति की भव्यता दर्शनीय है।

चित्तौड़गढ़ किले का महासती (जौहर स्थल)

समिध्देश्वर महादेव के मंदिर से महाराणा कुम्भा के कीर्कित्तस्तम्भ के मध्य एक विस्तृत मैदानी हिस्सा है, जो चारों तरफ से दीवार से घिरा हुआ है। इसमें प्रवेश के लिए पूर्व तथा उत्तर में दो द्वार बने हैं, जिसे महा सती द्वार कहा जाता है। ये द्वार व कोट रावल समरसिंह ने बनवाया था। चित्तौड़ पर बहादुर शाह के आक्रमण के समय यही हाड़ी रानी कर्मवती ने सम्मान व सतीत्व की रक्षा हेतु तेरह हजार वीरांगनाओं सहित विश्व प्रसिद्ध जौहर किया था। इस स्थान की खुदाई करने पर मिली राख की कई परतं इस करुण बलिदान की पुष्टि करती है। यहाँ दो बड़ी-बड़ी शिलाओं पर प्रशस्ति खुदवाकर उसके द्वार पर लगाई गई थी, जिसमें से एक अभी भी अस्तित्व में है।

चित्तौड़गढ़ किले का कीर्तिस्तम्भ (विजय स्तम्भ, जय स्तम्भ )

महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद शाह खिलजी को सन् 1440 ई. में प्रथम बार परास्त कर उसकी यादगार में इष्टदेव विष्णु के निमित्त यह कीर्तिस्तम्भ बनवाया था। इसकी प्रतिष्ठा सन्1448 ई. में हुई। यह स्तम्भ वास्तुकला की दृष्टि से अपने आप मंजिल पर झरोखा होने से इसके भीतरी भाग में भी प्रकाश रहता है। इसमें विष्णु के विभिन्न रुपों जैसे जनार्दन, अनन्त आदि, उनके अवतारों तथा ब्रम्हा, शिव, भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं, अर्धनारीश्वर (आधा शरीर पार्वती तथा आधा शिव का), उमामहेश्वर, लक्ष्मीनारायण, ब्रम्हासावित्री, हरिहर (आधा शरीर विष्णु और आधा शिव का), हरिहर पितामह (ब्रम्हा, विष्णु तथा महेश तीनों एक ही मूर्ति में), ॠतु, आयुध (शस्र), दिक्पाल तथा रामायण तथा महाभारत के पात्रों की सैकड़ों मूर्तियाँ खुदी हैं। प्रत्येक मूर्ति के ऊपर या नीचे उनका नाम भी खुदा हुआ है। इस प्रकार प्राचीन मूर्तियों के विभिन्न भंगिमाओं का विश्लेषण के लिए यह भवन एक अपूर्व साधन है। कुछ चित्रों में देश की भौगोलिक विचित्रताओं को भी उत्कीर्ण किया गया है। कीर्तिस्तम्भ के ऊपरी मंजिल से दुर्ग एवं निकटवर्ती क्षेत्रों का विहंगम दृश्य दिखता है। बिजली गिरने से एक बार इसके ऊपर की छत्री टूट गई थी, जिसकी महाराणा स्वरुप सिंह ने मरम्मन करायी।

चित्तौड़गढ़ का जटाशंकर महादेव देवालय

चित्तौड़गढ़ किले में कीर्तिस्तम्भ के उत्तर में जटाशंकर नामक शिवालय है। इस शिवालय के बाहरी हिस्से तथा सभामंडप की छत पर उत्कीर्ण देवताओं तथा अन्य तरह की आकृतियाँ बनी हुई है। अधिकतर मूर्तियाँ सुरक्षित हैं।

चित्तौड़गढ़ किले में कुम्भस्वामी (कुंभश्याम) का मंदिर

महाराणा कुम्भा ने सन् 1449 ई. में विष्णु के 12 अवतारो का यह भव्य मंदिर बनवाया था । इस मंदिर का गर्भ प्रकोष्ठ, मण्डप व स्तम्भों की सुन्दर मूर्तियाँ दर्शनीय हैं। विष्णु के विभिन्न रुपों को दर्शाती हुई मूर्तियाँ, नागर शैली के बने गगनचुम्बी शिखर तथा समकालीन मेवाड़ी जीवन शैली को अंकित करती दृश्यावली, इस मंदिर की विशिष्टतायें हैं। मूल रूप से तो यहाँ, वराहावतार की ही मूर्ति स्थापित थी, लेकिन मुस्लिम आक्रमणों से मुर्ति खण्डित होने पर अब कुम्भास्वामी की मूर्ति प्रतिष्ठापित कर दी गयी।

चित्तौड़गढ़ किले में मीराँबाई का मंदिर

कुम्भस्वामी के मंदिर के प्रांगण में ही एक छोटा मंदिर है | जिसे कृष्ण दीवानी भांतिमति मीराँबाई का मंदिर कहते हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार पहले यह मंदिर ही कुंभ श्याम का मंदिर था | इस मंदिर के निज भाग में भांतिमति मीरा व उसके आराध्य मुरलीधर श्रीकृष्ण का सुंदर चित्र है। मंदिर के सामने ही एक छोटी-सी छतरी बनी हुई है। यहाँ मीरा के गुरु स्वामी रैदास के चरणचिंह अंकित हैं।

चित्तौड़गढ़ किले का सतबीस देवलां

11वीं शताब्दी में बना यह भव्य जैन मंदिर अपनी उत्कृष्ट नक्काशी के काम के लिए जाना जाता है। इसमें 27 देवरियाँ बनी है। अतः इस मंदिर को सतबीस (7अ20 देवरा) कहा जाता है।

महाराणा कुंभा के महल

13वीं शताब्दी में निर्मित इन महलों का जीर्णोद्धार महाराजा कुंभा द्वारा कराये जाने से इन महलों को महाराणा कुंभा का महल कहा जाता है। प्रवेश द्वार बड़ी पोल तथा त्रिपोलिया कहे जाते हैं। सूरज गोरवड़ा, जनाना महल, कँवलदा महल, दीवात-ए-आम तथा शिव मंदिर इस महल के कुछ उल्लेखनीय हिस्से हैं। मान्यता है कि इन्हीं महलों में एक तहखाना है, जिसमें एक सुरंग के माध्यम से गोमुख तक जाया जा सकता है। महारानी पद्मिनी ने हजारों वीरांगनाओं के साथ इसी रास्ते गौमुख कुंड में स्नान करने के बाद इन्हीं तहखानों में जौहर किया था, लेकिन यहाँ इस तरह के किसी सुरंग का प्रमाण नहीं मिला है। इसी ऐतिहासिक महल में उदयपुर के संस्थापक महाराणा उदयसिंह का जन्म हुआ था तथा यहीं स्वामीभक्त पन्नाधाय ने उदयसिंह की रक्षार्थ अपने लाडले पुत्र को बनवीर के हाथों कत्ल हो जाने दिया। मीराँबाई की कृष्ण भक्ति तथा विषपान की घटनाएँ भी इसी महल से संबद्ध है।

चित्तौड़गढ़ किले का फतह प्रकाश

महाराणा फतहसिंह द्वारा निर्मित यह भव्य महल आधुनिक ढ़ंग का है। फतहसिंह के नाम पर ही इन्हें फतह प्रकाश कहा जाता है। महल में गणेश की एक विशाल प्रतिमा, फव्वारा तथा विविध भित्ति चित्र दर्शनीय हैं।

चित्तौड़गढ़ किले का मोती बाजार

फतहप्रकाश के पास ही भग्नावस्था में दूकानों की कतारें हैं। बताया जाता है कि शताब्दियों पूर्व यहाँ कीमती पत्थरों की दुकानें हुआ करती थी।

चित्तौड़गढ़ किले का शृंगार चौरी सिंगार चौरी

सन् 1448 में महाराणा कुंभा के कोषाध्यक्ष बेलाक, जो केल्हा साह का पुत्र था ने श्रृंगार चौरी का निर्माण करवाया था। यह शान्तिनाथ का मंदिर है तथा जैन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। श्रृंगार चौरी के बारे में एक मान्यता यह भी है कि यहीं महाराणा कुंभा की राजकुमारी का विवाह हुआ था, लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से सोचने पर यह सत्य नहीं लगता।

चित्तौड़गढ़ किले में महाराणा साँगा का देवरा

श्रृंगार चौरी के दक्षिण में स्थित इस मंदिर का निर्माण महाराणा साँगा ने भगवान देवनारायण की आराधना हेतु करवाया था। कहा जाता है कि भगवान द्वारा दिये कवच को महाराणा इसी देवरे में पहन कर युद्धों में जाते और विजित होकर लौटते थे।

चित्तौड़गढ़ किले में तुलजा भवानी का मंदिर

इस मंदिर का निर्माण सन् 1536-1540ई. है। इसका निर्माण दासी पुत्र बनवीर ने कराया था। बनवीर भवानी का उपासक था और उसने अपने वजन के बराबर स्वर्ण इत्यादि तुलवा कर इस मंदिर का निर्माण आरंभ कराया था, इसी कारण इसे तुलजा भवानी का मंदिर कहा जाता है।

चित्तौड़गढ़ किले में बनवीर की दीवार

सन् 1536 ई. में महाराणा विक्रमादित्य को छल से मारकर दासीपुत्र बनवीर चित्तौड़ का स्वामी बन बैठा। अपनी स्थिति को अधिक सुदृढ़ व सुरक्षित करने हेतु उसने दुर्ग को दो भागों में विभाजित कर दीवार का निर्माण आरंभ कराया था | परंतु महाराणा उदयसिंह द्वारा सन् 1540 ई में चित्तौड़ से खदेड़ दिये जाने के बाद इसका निर्माण अधूरा ही रह गया।

चित्तौड़गढ़ किले का नवलखा भण्डार

चित्तौड़गढ़ किले के पश्चिमी सिरे पर एक अर्द्ध वृत्ताकार अपूर्ण बुर्ज बना हुआ है जिसे बनवीर ने अपनी सुरक्षा व अस्त्र सस्त्र के भण्डार हेतु बनवाया था। इसकी पेंचिदी बनावट को कोई जान नहीं सकता था। अतः इसे नवलखा भण्डार कहा जाता था। कुछ लोगो का कहना हैं कि यहाँ नौ लाख रुपयों का खजाना रहता था, जिससे इसका नाम नौ लखा भण्डार पड़ा।

चित्तौड़गढ़ का पातालेश्वर महादेव का मंदिर

पुरातत्व संग्रहालय के पास स्थित इस भय मंदिर का निर्माण सन् 1565 ई. में हुआ था। मंदिर की स्थापत्य कला एवं उत्कीर्ण आकृतियाँ बड़ी आकर्षण एवं दर्शनीय लगती है।

चित्तौड़गढ़ में भामाशाह की हवेली

हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप का राजकोष खाली हो गया था व मुगलों से युद्ध के लिए बहुत बड़ी धनराशि की आवश्यकता थी। ऐसे कठिन समय में प्रधानमंत्री भामाशाह ने अपना पीढियों से संचित धन महाराणा को भेंट कर दिया। भामाशाह द्वारा दी गई राशि मालवा को लूट कर लाई गई थी, जिसे भामाशाह ने सुरक्षा की दृष्टि से कहीं गाड़ रखी थी।

चित्तौड़गढ़ के किले में आल्हा काबरा की हवेली

भामाशाह की हवेली के पास ही आल्हा काबरा की हवेली है। काबरा गौत्र के माहेश्वरी पहले महाराणा के दीवान थे।

चित्तौड़गढ़ के किले के पास नगरी गाँव

चित्तौड़ के किले से 7 मील उत्तर में नगरी नाम का एक प्राचीन स्थान है | जो बेदले के चौहान सरदार की जागीर में पड़ता था। यह भारतवर्ष के प्राचीन नगरों में से एक है | जिसके अवशेष खंडहरों के रूप में दूर-दूर तक फैले हुए हैं, जहाँ कोट से घिरे हुए राजप्रासाद होने का अनुमान किया जाता है। यहाँ से कई जगहों पर बावड़ी, महलों के काट आदि के निर्माणार्थ पत्थर ले जाये गये। महाराणा रायमल की रानी श्रृंगारदेवी की बनवाई हुई घोसड़ी गाँव की बावड़ी भी नगरी से ही पत्थर लाकर बनाई गई है। नगरी का प्राचीन नाम मध्यमिका था। बली गाँव (अजमेर जिला में) से मिले हुए सन् 443 ई. पू. के शिलालेख में इस नाम का प्रमाण मिलता है। पतंजलि ने अपने महाभाष्य मध्यमिका पर युनानियों (मिनैंडर) के आक्रमण का उल्लेख किया है। वहाँ से मिलने वाले शिलालेखों में से तीन वि. सं. पूर्व की तीसरी शताब्दी के आसपास की लिपि में है। इनके लेखों से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि वि. सं. पूर्व की तीसरी शताब्दी के आसपास विष्णु की पूजा होती थी तथा उनके मंदिर भी बनते थे। एक शिलालेख सर्वतात नामक किसी राजा द्वारा संपादित अश्वमेघ यज्ञ का उल्लेख करता है। एक अन्य शिलालेख वाजपेय यज्ञ के सम्पादन की चर्चा करता है।

नगरी से थोड़ी ही दूरी पर हाथियों का बाड़ा नाम का एक विस्तृत स्थान है, जिसकी चहारदीवारी बहुत लंबी व चौड़ी है। यह तीन-तीन मोटे पत्थरों को एक के ऊपर एक रखकर बनाई गई है। उस समय ऐसे विशाल पत्थरों को इस प्रकार व्यवस्थित करना एक कठिन कार्य जान पड़ता है। यहाँ से कुछ ही दूरी पर बड़े-बड़े पत्थरों से बनी हुई एक चतुरस्र मीनार है, जिसे लोग ऊमदीवट कहते हैं। यह स्पष्ट जान पड़ता है कि इस मीनार में इस्तेमाल किये गये पत्थर हाथियों का बाड़ा से ही तोड़कर लाये गये थे। इसके संबंध में यह कहा जाता है कि जब बादशाह अकबर ने चित्तौड़ पर चढ़ाई किया तब इस मीनार में रौशनी की जाती थी। नगरी के निकट तीन स्तूपों के चिंह भी मिलते हैं। वर्तमान में गाँव के भीतर माताजी के खुले स्थान में प्रतिमा के सामने एक सिंह की प्राचीन मूर्ति जमीन में कुछ गड़ी हुई है। पास में ही चार बैलों की मूर्तियोंवाला एक चौखूंटा बड़ा पत्थर रखा हुआ है। ये दोनों टुकड़े प्राचीन विशाल स्तम्भों का ऊपरी हिस्सा हो सकता है।

रानी पद्मिनी के जौहर की सामान्य जानकारी

रानी पद्मिनी चित्तौड़ की रानी थी। रानी पद्मिनि के बलिदान की कहानी इतिहास में अमर है। सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की बेटी पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रतनसिंह की पत्नी थी । रानी पद्मिनी वास्तव में ही बहुत खूबसूरत स्त्री थी | अलाउद्दीन खिलजी ने दर्पण में रानी पद्मिनि का प्रतिबिंब देखा था और उसके सम्मोहित करने वाले सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गया था। अलाउद्दीन खिलजी को रानी पद्मिनी की खूबसूरती पर कायल हो गया और अलाउद्दीन ने किसी भी कीमत पर रानी पद्मिनी को हासिल करना चाहता था | इसलिए अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। रानी पद्मिनी ने आग में कूदकर जान दे दी, लेकिन अपनी आन-बान पर आँच नहीं आने दी। और कुलीन रानी ने लज्जा को बचाने के लिए जौहर करना बेहतर समझा।

रानी पद्मिनी का सामान्य परिचय

पद्मिनी सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की अद्वितीय सुंदरी राजकन्या तथा चित्तौड़ के राजा भीमसिंह अथवा राजा रत्नसिंह की रानी थी। उसके रूप, यौवन और जौहर की कथा, मध्यकाल से लेकर वर्तमान काल तक चारणों, भाटों, कवियों, धर्मप्रचारकों और लोकगायकों द्वारा विविध रूपों एवं आशयों में व्यक्त हुई है। पद्मिनी संबंधी कथाओं में सर्वत्र यह स्वीकार किया गया है

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