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आषाढ महीने का अंतिम दिन होता हैं गुरु पूर्णिमा का

गुरु पूर्णिमा के दिन बहुत से लोग अपने गुरु के लिए व्रत भी रखते हैं। इस दिन गंगा या किसी अन्य नदी में स्नान करने के बाद पूजा करने का विधिविधान होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ‘गुरुपूर्णिमा’ कहते हैं। इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। पूरे भारत में यह त्योहार श्रृद्धा के साथ मनाया जाता है। इस बार गुरु पूर्णिमा 9 जुलाई को है। खासतौर से गुरु की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है।

महर्षि वेदव्यास को प्रथम गुरु क्यों मानते हैं

हिन्दू धर्म में गुरु का दर्जा भगवान से भी ऊपर माना जाता है। कहा जाता है कि आषाढ़ पूर्णिमा को वेद व्यास जी का जन्म हुआ था। इस लिये महर्षि वेदव्यास जी को प्रथम गुरु माना जाता है यमुना के किसी द्वीप में इनका जन्म हुआ था। व्यासजी कृष्ण द्वैपायन कहलाये क्योंकि उनका रंग श्याम था। वे पैदा होते ही माँ की आज्ञा से तपस्या करने चले गये थे और कह गये थे कि जब भी तुम स्मरण करोगी, मैं आ जाऊंगा। वे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर के जन्मदाता ही नहीं, अपितु विपत्ति के समय वे छाया की तरह पाण्डवों का साथ भी देते थे

गुरु पूर्णिमा के दिन दान पुण्य करने का अलग महत्व है

गुरु पूर्णिमा के दिन दान पुण्य करने का अलग महत्व है। कहा जाता है कि आषाढ़ी पूर्णिमा को दान पुण्य अवश्य करना चाहिए। इस दिन दान करने से बुद्धि-विवेक की प्राप्ति होती है। इस दिन गुरु की विशेष पूजा आराधना करनी चाहिए। इसके साथ ही विष्णु भगवान की भी विशेष पूजा अर्चना करनी चाहिए। मौनी अमावस्या के दिन अलग-अलग चीजों का दान करके आप अपनी हर मनोकामना पूरी कर सकते हैं. पारिवारिक जीवन की खुशहाली के लिए पात्र सहित घी का दान करें. किसी भी प्रकार की बाधा से मुक्ति के लिए नमक का दान करें. वंश वृद्धि और संतान की उन्नति के लिए चांदी का दान करें.मोक्ष के लिए गौ दान करें. आर्थिक समृद्धि के लिए भूमि दान करें. ग्रह- नक्षत्र की बाधा से मुक्ति के लिए काले तिलों का दान करें.

गुरु की विशेष पूजा आराधना कैसे करे जानिए कैसे

गुरु पूजा का मतलब गुरु के आगे फल, फूल या नारियल चढ़ाना नहीं है, बल्कि यह दिव्यता को आमंत्रित करने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। हम लोग इस काम को सरलतम तरीके से कर रहे हैं, क्योंकि ईशा एक धर्मनिरपेक्ष संगठन है, जहां हम कर्मकांड को काफी हल्के स्तर पर ही रखते हैं। सबसे पहले अपने घर में साफ सफाई करे और एक स्थान पर जगत गुरु वेद व्यास जी की प्रतिमा लगाये या एक सफ़ेद कपड़ा लेकर उस पर पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण गंध से बारह-बारह रेखाएं बनाकर व्यासपीठ बनाएं।

  • उस के बाद इस मंत्र का उचारण करे तत्पश्चात ‘गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये’ मंत्र से संकल्प करें।
  • इस के बाद दशों दिशा में जल छिडके
  • अब ब्रह्माजी, व्यासजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम मंत्र से पूजा, आवाहन आदि करें।
  • सबसे पहले आप गुरु मंत्र का उचारण करे

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