कृष्ण जनामाष्टमी 2017 दिन समय पूजा मुहर्त पूजा विधि का महत्व व पौराणिक कथा की जानकारी

श्री कृष्णजन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्स्व है। कृष्णा जन्माष्टमी हिन्दुओ का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है | कृष्णा जन्माष्टमी का त्यौहार भारत में बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है | यह त्यौहार श्रावण माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में मनाया जाता है | जन्माष्टमी के दिन महिलाये व पुरुष 12 बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन सभी मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान श्री कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और मंदिरों में रासलीला का आयोजन होता है। कृष्णा जन्माष्टमी, जिसे कृष्णष्टमी, सतम, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयंती, श्री जयंती या कभी-कभी केवल जन्माष्टमी के रूप में जाना जाता है, हिंदू देवता कृष्ण के विष्णु के आठवें अवतार के जन्म का वार्षिक उत्सव है।

कृष्ण जनामाष्टमी 2017 Krishna Janamashtami 2017

कब हुआ था भगवान श्री कृष्ण का जन्म When was the birth of Lord Shri Krishna

भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव को ही जन्माष्टमी कहा जाता है। पौराणिक कथाओ के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि 12 बजे अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में जन्म लिया । चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे । अत: भाद्रपद मास में आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यदि रोहिणी नक्षत्र का भी संयोग हो तो वह और भी भाग्यशाली माना जाता है

कृष्ण जनामाष्टमी 2017 दिनांक Date of Krishna Janamashtami 2017

कृष्णा जन्माष्टमी को पूरे भारत में और साथ सोमवार 14 अगस्त 2017 को मनाया जाएगा।

कृष्णा जनामाष्टमी 2017 पर पूजा मुहूर्त Krishna Janamashtami Puja Muhurt on 2017

कृष्णा जन्माष्टमी 2017 में पूजा की पूरी अवधि 45 मिनट के लिए होगी । 14 अगस्त रात समय 11:58 बजे अंधेरी आधी रात में शुरू होगा और रात में 12.43 बजे समाप्त होगा।

कृष्णा जनामाष्टमी पूजा विधि Krishna Janamashtami Puja Vidhi

सम्पूर्ण भारत में कृष्ण जनामाष्टमी रात 12 बजे मनाई जाती है | प्रतेक वर्ष भदाव मास की अस्ठ्मी के दिन लोग श्री कृष्णा जन्म का उत्सव मानते है | और जन्म के बाद कृष्णा का दूध दही सहद व जल से स्नान कराते है | और माखन मिश्री ,पंजीरी खीर ,ककड़ी का भोग लगते है | उसके बाद श्री कृष्णा जी की आरती करते है | और उसके बाद खुसी से रात भर भजनों का आयोजन किया जाता है | कहा जाता है की भगवन श्री कृष्ण को माखन मिश्री बहुत पसंद थे | क्यू की वह गोपियों की मटकिया फोड़ा करते थे | इसलिए उन्हें माखन चोर भी कहा जाता है | इसी लिए भगवान श्री कृष्णा को माखन और मिश्री का भोग लगाया जाता है |

पुराणों के अनुसार उपवास के लाभ और दोष According to the Puranas, the benefits and defects of fasting

स्कन्द पुराण के अनुसार

स्कन्द पुराण के अनुसार जो भी व्यक्ति भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता वह मनुष्य जंगली होता है।

ब्रह्मपुराण के अनुसार

ब्रह्मपुराण के अनुसार कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के 28वे युग में माता देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण पैदा हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें।

भविष्य पुराण के अनुसार

भविष्य पुराण के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता है वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना बताया गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो ‘जयंती’ नाम से संबोधित की जाएगी।

वह्निपुराण के अनुसार

वह्निपुराण के अनुसार श्री कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए।

विष्णु पुराण के अनुसार

विष्णुरहस्यादि वचन से कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नामवाली ही कही जाएगी।

वसिष्ठ संहिता के अनुसार

वसिष्ठ संहिता का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए।

स्कन्द पुराण के अनुसार

मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है। वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।

विष्णु धर्म के अनुसार

विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। भृगु ने कहा है- जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अन्त में पारणा करें। इसमें केवल रोहिणी उपवास भी सिद्ध है। अन्त्य की दोनों में परा ही लें।

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा Legend of Lord Krishna’s birth

एक बार की बात है द्वापर युग में राजा उग्रसेन मथुरा पर राज करता था |उसके पुत्र कंस को उसने राज़ सिहासन से उतार दिया था | और खुद मथुरा का राज़ बन गया | कंस की मुह बोली बहन देवकी जिसका विवहा वासुदेव नामक यदुवंशी से हुआ | एक बार की बात है कंस अपनी बहन को ससुराल छोड़ने जा रहा था | रास्ते में आकाशवाणी हुई की हे कंस तू जिस को ले जा रहा है | उसी के गर्भ से पैदा होने वाला 8वा लड़का तेरा वध करेगा | यह बात सुन कर कंस वासुदेव को मरने की सोच लेता है | तब देवकी ने कंस से कहा की तुम उसे मत मारो में तुमहारे उस बच्चें को लादुंगी | कंस ने देवकी की यह बात मान ली और मथुरा चला गया | कंस ने वसुदेव और देवकी को जेल में डाल दिया। देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। तो जेल के बहार कंस ने कड़ा पहरा लगवा दिया | उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय सोचा । जिस समय वसुदेव व देवकी को पुत्र पैदा हुआ था | उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ | जो और कुछ नहीं सिर्फ माया थी। जिस जेल में देवकी थी | उसमे अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े | तब भगवान ने उनसे कहा अब मैं पुनःनवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।

तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेजदो और उनके यहां जो कन्या जन्मी है उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। और जेल के दरवाज़े अपने आप खुल जायेंगे | यमुना नदी तुम्हे अपना रास्ता देगी उसी समाय वसुदेव नवजात शिशु का रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर जेल से निकल पड़े और यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए।और जेल के दरवाज़े अपने आप बंद हो गए | इसके बाद कंस को पता चला की देवकी के बच्चा हुआ है |

उसने जेल में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहता था | परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- अरे मूर्ख कंस मुझे मारने से क्या होगा | तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।’

कृष्णा जनामाष्टमी उत्सव Krishna Janamashtami festival

श्री कृष्ण जन्माष्टमी को भारत के कई सभी हिस्सों में मनाया जाता है कृष्ण भक्त घर और मंदिर में एक रंगीन झूला बनाते हैं और भगवान कृष्ण को जन्म के बाद फूलों और पत्तियों से सजाते हैं। कहीं यह रास लीला और दहीहंडी को कृष्ण के जीवन के नाटकीय प्रदर्शन को दिखाने के लिए एक महान स्तर के आयोजन के द्वारा मनाया जाता है। एक छोटा लड़का रास लीला और दही हंडी को कृष्ण के रूप में सजाया जाता है।

मथुरा में कृष्ण जन्म उत्सव Krishna Birth Festival in Mathura

मथुरा भगवान कृष्ण का जन्म स्थान है वहा लोग अत्यधिक उत्सुक होते हैं जब कृष्ण जन्माष्टमी की तारीख करीब आती है। तो मथुरा जन्माष्टमी के अनूठे उत्सव के लिए बहुत प्रसिद्ध है भक्तों ने शिशु कृष्ण की मूर्ति को स्नान करवाया जाता है| और भगवान को चप्पपन भोग लगाया जाता है । सम्पूर्ण पूजा के बाद यह प्रसाद भक्तों को वितरित किया जाता है। इस दिन पूरे शहर को फूलों गहने और रोशनी से सजाया जाता है। मथुरा के लोग पारंपरिक रूप से इस त्योहार को मनाते हैं और इस की झाकी के लिए एक बड़ी तैयारी करते हैं। कृष्ण के बचपन के दृश्यों को ध्यान में रखते हुए सभी बच्चों और बुजुर्ग झाकी में सामिल होते हैं।

श्री कृष्ण स्मरण का महत्व Importance of Shri Krishna remembrance

सकृन्मनः कृष्णापदारविन्दयोर्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह।

न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान्‌ स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः॥

जो मनुष्य केवल एक बार श्रीकृष्ण के गुणों में प्रेम करने वाले अपने चित्त को श्रीकृष्ण के चरण कमलों में लगा देते हैं, वे पापों से छूट जाते हैं, फिर उन्हें पाश हाथ में लिए हुए यमदूतों के दर्शन स्वप्न में में भी नहीं होते।

अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः
क्षिणोत्यभद्रणि शमं तनोति च।

सत्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं
ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम्‌॥

श्रीकृष्ण के चरण कमलों का स्मरण सदा बना रहे तो उसी से पापों का नाश, कल्याण की प्राप्ति, अन्तः करण की शुद्धि, परमात्मा की भक्ति और वैराग्ययुक्त ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति आप ही हो जाती है।

 

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