श्रावण मास का महत्व कथाएँ पूजन विधि और जाने सोमवार के व्रत के बारे मैं विशेष

श्रावण मास का महत्व : हिंदु पंचांग के अनुसार सभी मासों को किसी न किसी देवता के साथ संबंधित देखा जा सकता है उसी प्रकार श्रावण मास को भगवान शिव जी के साथ देखा जाता है इस समय शिव आराधना का विशेष महत्व होता है | श्रावण मास अपना एक विशिष्ट महत्व रखता है | श्रवण नक्षत्र तथा सोमवार से भगवान शिव शंकर का गहरा संबंध है | श्रावण मास मैं धर्म और आस्था का अटूट गठजोड़ हमें दिखाई देता है इस माह की प्रत्येक तिथि किसी न किसी धार्मिक महत्व के साथ जुडी़ हुई होती है | इसका हर दिन व्रत और पूजा पाठ के लिए महत्वपूर्ण रहता है | श्रावण मास वर्षा ऋतू का महिना हैं | श्रावण मास का हर दिन पूजा पाठ का दिन हैं इस महीने मैं कई त्योंहार मनाये जाते हैं जैसे तीज,श्रावण शिवरात्रि,रक्षा बंधन,हरियाली तीज,नाग पंचमी,श्रावण पूर्णिमा,

श्रावण के सोमवार का महत्व

श्रावण मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है | इस माह में प्रत्येक सोमवार के दिन भगवान श्री शिव की पूजा करने से व्यक्ति को समस्त सुखों की प्राप्ति होती है | श्रावण मास के विषय में प्रसिद्ध एक पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रावण मास के सोमवार व्रत, जो व्यक्ति करता है उसकी सभी इछाएं पूर्ण होती है | इन दिनों किया गया दान पूण्य एवं पूजन समस्त ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के समान फल देने वाला होता है | इस व्रत का पालन कई उद्देश्यों से किया जा सकता है | जैसे –

वैवाहिक जीवन की लम्बी आयु और संतान की सुख-समृ्द्धि के लिये या मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए करती है| इस दौरान कुँवारी लड़कियाँ सुंदर और अच्छे पति की कामना करती हैं। जिससे उन्हें एक अच्छा पति मिले। यही नहीं जो भी व्यक्ति इस माह में शिव जी की अराधना सच्चे मन से करता है उसे मन चाहा वरदान मिलता है साथी ही उसके सारे रोग और दरिद्रता भी दूर होती है।सावन सोमवार व्रत कुल वृद्धि, लक्ष्मी प्राप्ति और सुख -सम्मान देने वाले होते हैं. इन दिनों में भगवान शिव की पूजा जब बेलपत्र से की जाती है, तो भगवान अपने भक्त की कामना जल्द से पूरी करते है. बिल्व पत्थर की जड में भगवान शिव का वास माना गया है इस कारण यह पूजन व्यक्ति को सभी तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त होता है.

शिवलिंग पर जलाभिषेक का महत्व

शिवलिंग का अभिषेक महाफलदायी माना गया है | इन दिनों अनेक प्रकार से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है जो भिन्न भिन्न फलों को प्रदान करने वाला होता है | जैसे कि जल से वर्षा और शितलता कि प्राप्ति होती है | दूग्धा अभिषेक एवं घृत से अभिषेक करने पर योग्य संतान कि प्राप्ति होती है | ईख के रस से धन संपदा की प्राप्ति होती है | कुशोदक से समस्त व्याधि शांत होती है | दधि से पशु धन की प्राप्ति होती है ओर शहद से शिवलिंग पर अभिषेक करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है | इस श्रावण मास में शिव भक्त ज्योतिर्लिंगों का दर्शन एवं जलाभिषेक करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त करता है तथा शिवलोक को पाता है.

श्रावण मास के प्रमुख त्योंहारो की कथा

सोमवार व्रत पूजन विधि

सोमवार के दिन प्रात:काल उठकर नित्य-क्रम कर स्नान कर लें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा गृह को स्वच्छ कर शुद्ध कर लें। सभी सामग्री एकत्रित कर लें। शिव भगवान की प्रतिमा के सामने आसन पर बैठ जायें। किसी भी पूजा या व्रत को आरम्भ करने के लिये सर्व प्रथम संकल्प करना चाहिये। व्रत के पहले दिन संकल्प किया जाता है। उसके बाद आप नियमित पूजा और व्रत करें।

सोमवार व्रत की कथा

एक समय की बात है, किसी नगर में एक साहूकार रहता था. उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी इस कारण वह बहुत दुखी था. पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था | उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया. पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि ‘हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है.’ लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई | माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी. माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था. उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख. वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा | कुछ समय के बाद साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ. जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया. साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराना. जहां भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना.

दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े. रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था. लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था. राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची |
साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया. उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं. विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा. लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया. लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार था. उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी | उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि ‘तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है. मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं | जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई. राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया जिससे बारात वापस चली गई. दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया. जिस दिन लड़के की आयु 12 साल की हुई उसी दिन यज्ञ रखा गया. लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है. मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर सो जाओ |

शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए. मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप शुरू किया. संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे. पार्वती ने भगवान से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा. आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें | जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया. अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है. लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे |माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया. शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया. शिक्षा समाप्त करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया. दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था. उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया. उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की और अपनी पुत्री को विदा किया | इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे. उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए. उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है. इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं |

श्रावण मास में सोलह सोमवार का महत्व

श्रावण मास में भगवान त्रिलोकीनाथ, डमरूधर भगवान शिवशंकर की पूजा अर्चना का बहुत अधिक महत्व है। भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए श्रावण मास में भक्त लोग उनका अनेक प्रकार से पूजन अभिषेक करते हैं। भगवान भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होने वाले देव हैं, वह प्रसन्न होकर भक्तों की इच्छा पूर्ण करते हैं। महिलाएं श्रावण से सोलह सोमवार का व्रत धारण (प्रारंभ) करती है, सुहागन महिला अपने पति एवं पुत्र की रक्षा के लिए कुंवारी कन्या इच्छित वर प्राप्ति के लिए एवं अपने भाई पिता की उन्नति के लिए पूरी श्रद्धा के साथ व्रत धारण करती है। श्रावण से सोलह सोमवार कुल वृद्धि के लिए, लक्ष्मी प्राप्ति के लिए, सम्मान के लिए भी किया जाता है।

श्रावण मास में सोलह सोमवार की कथा

एक बार सावन के महीने में अनेक ऋषि क्षिप्रा नदी में स्नान कर उज्जैन के महाकाल शिव की अर्चना करने हेतु एकत्र हुए। वह अभिमानी वेश्या भी अपने कुत्सित विचारों से ऋषियों को धर्मभ्रष्ट करने चल पड़ी। किंतु वहां पहुंचने पर ऋषियों के तपबल के प्रभाव से उसके शरीर की सुगंध लुप्त हो गई। वह आश्चर्यचकित होकर अपने शरीर को देखने लगी। उसे लगा, उसका सौंदर्य भी नष्ट हो गया। उसकी बुद्धि परिवर्तित हो गई। उसका मन विषयों से हट गया और भक्ति मार्ग पर बढ़ने लगा।
उसने अपने पापों के प्रायश्चित हेतु ऋषियों से उपाय पूछा, वे बोले- ‘तुमने सोलह श्रंगारों के बल पर अनेक लोगों को धर्मभ्रष्ट किया, इस पाप से बचने के लिए तुम सोलह सोमवार व्रत करो और काशी में निवास करके भगवान शिव का पूजन करो।’ वेश्या ने ऐसा ही किया और अपने पापों का प्रायश्चित कर शिवलोक पहुंची। सोलह सोमवार के व्रत से कन्याओं को सुंदर पति मिलते हैं तथा पुरुषों को सुंदर पत्नियां मिलती हैं। श्रावण मास श्रावण मास में शिव की पूजा करने से प्रायः सभी देवताओं की पूजा का फल मिल जाता है।

श्रावण पूर्णिमा व्रत विधि 2017

वर्ष 2017 में श्रावण पूर्णिमा व्रत (Shravan Purnima Vrat 2017) अगस्त महीने की 07 तारीख को रखा जाएगा।नारद पुराण के अनुसार श्रावण मास को पड़ने वाली पूर्णिमा के दिन देवताओं , ऋषियों तथा पितरों का तर्पण करना चाहिए। विभिन्न प्रकार की पूजा विधियों द्वारा ऋषियों की पूजा करनी चाहिए। इस दिन लाल कपड़े में सरसों और अक्षत रखकर उसे लाल धागे से बांधकर पानी से सींचकर तांबे के बर्तन में रखना चाहिए।इसके बाद भगवान विष्णु सहित अन्य देवताओं की पूजा करनी चाहिए। पूजा समाप्ति पर ब्राह्मण से अपने हाथ पर पोटली का रक्षा सूत्र बंधवाना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उनको दक्षिणा दे वेदों का स्वाध्याय करना चाहिए।

श्रावण मासी हर्ष मानसी मराठी कविता

श्रावण मासी हर्ष मानसी हिरवळ दाटे चोहिकडे,
क्षंणात येते सर सर शिरवे क्षंणात फिरुनि ऊन पडे

वरति बघता इंद धनुचा गोफ दुहेरि विणलासे
मंगल तोरण काय बांधले नभोमंडपी कुणी भासे

झालासा सुर्यास्त वाटतो,सांज अहाहा तो उघडे
तरु शिखरावर उंच घरावर पिवळे पिवळे ऊन पडे

उठती वरती जलदांवरती अनंत संध्याराग पहा
सर्व नभावर होय रोखिले सुंदरतेचे रुप महा

बलाकमाला उडता भासे कल्पसुमांची माळिच ते
उतरुनि येती अवनीवरती ग्रहगोलचि की एकमते

फडफड करुनि भिजले अपुले पखं पाखरे सावरती
सुंदर हरिणी हिरव्या कुरणी निजबाळांसह बागडती

खिल्लारे ही चरती रानी गोपही गाणी गात फिरे
मंजूळ पावा गाई तयांचा श्रावण महिमा एकसुरे

सुवर्ण चंपक फुलला विपिनी रम्य केवडा दरवळला
पारिजातही बघता भामा रोष मनीचा मावळला

सुंदर परडी घेऊनि हाती पुरोपकंठी शु्द्धमती
सुंदर बाला या फुलमाला रम्य फुले पत्री खुडती

देव दर्शना निघती ललना हर्ष मावे ना हदयात
वदनी त्यांच्या वाचून घ्यावे श्रावण महिन्याचे गीत

 

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