तेजा दशमीं पर वीर तेजाजी महाराज का मेला ,जीवन की कहानी व क्यों मनाया जाता हैं तेजा दशमीं का पर्व

तेजादशमी का पर्व Veer Teja Ji Mela 2018 In Rajasthan : तेजादशमी का पर्व संपूर्ण भारत के सभी राज्यों मैं श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास के प्रतीक के रूप मई मनाया जाता है। भाद्रपद शुक्ल दशमी को तेजदशमी पर्व मनाया जाता है। नवमी की पूरी रात रातीजगा करने के बाद दूसरे दिन दशमी को जिन-जिन स्थानों पर वीर तेजाजी के मंदिर हैं, मेला लगता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु नारियल चढ़ाने एवं बाबा की प्रसादी ग्रहण करने तेजाजी मंदिर में जाते हैं। इन मंदिरों में वर्षभर से पीड़ित, सर्पदंश सहित अन्य जहरीले कीड़ों की ताँती (धागा) छोड़ा जाता है। सर्पदंश से पीड़ित मनुष्य, पशु यह धागा सांप के काटने पर, बाबा के नाम से, पीड़ित स्थान पर बांध लेते हैं। इससे पीड़ित पर सांप के जहर का असर नहीं होता है और वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाता है। आप जरूर जानना चाहेंगे कि आखिर तेजादशमी के पर्व की शुरूआत कैसे हुई आइए आपको बताते हैं…

क्यूं मनाया जाता है तेजादशमी का पर्व

लोक देवता तेजाजी का जन्म नागौर जिले में खड़नाल गांव में ताहरजी (थिरराज) और रामकुंवरी के घर माघ शुक्ला, चौदस संवत 1130 यथा 29 जनवरी 1074 को जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता गांव के मुखिया थे। वे बचपन से ही वीर, साहसी एवं अवतारी पुरुष थे। बचपन में ही उनके साहसिक कारनामों से लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे। बड़े होने पर राजकुमार तेजा की शादी सुंदर गौरी से हुई।

तेजादसमीं पर तेजाजी की कहानी

Teja Ji Story In Hindi on Teja Dasmi : एक बार अपने साथी के साथ तेजा अपनी बहन पेमल को लेने उनकी ससुराल जाते हैं। बहन पेमल की ससुराल जाने पर वीर तेजा को पता चलता है कि मेणा नामक डाकू अपने साथियों के साथ पेमल की ससुराल की सारी गायों को लूट ले गया। वीर तेजा अपने साथी के साथ जंगल में मेणा डाकू से गायों को छुड़ाने के लिए जाते हैं। रास्ते में एक बांबी के पास भाषक नामक नाग (सर्प) घोड़े के सामने आ जाता है एवं तेजा को डसना चाहता है।

वीर तेजा उसे रास्ते से हटने के लिए कहते हैं, परंतु भाषक नाग रास्ता नहीं छोड़ता। तब तेजा उसे वचन देते हैं कि ’हे भाषक नाग मैं मेणा डाकू से अपनी बहन की गायें छुड़ा लाने के बाद वापस यहीं आऊंगा, तब मुझे डस लेना, यह तेजा का वचन है।’ तेजा के वचन पर विश्वास कर भाषक नाग रास्ता छोड़ देता है।
जंगल में डाकू मेणा एवं उसके साथियों के साथ वीर तेजा भयंकर युद्ध कर उन सभी को मार देते हैं। उनका पूरा शरीर घायल हो जाता है। ऐसी अवस्था में अपने साथी के हाथ गायें बहन पेमल के घर भेजकर वचन में बंधे तेजा भाषक नाग की बांबी की और जाते हैं।

घोड़े पर सवार पूरा शरीर घायल अवस्था में होने पर भी तेजा को आया देखकर भाषक नाग आश्चर्यचकित रह जाता है। वह तेजा से कहता है- ’तुम्हारा तो पूरा शरीर कटा-पिटा है, मैं दंश कहां मारूं।’ तब वीर तेजा उसे अपनी जीभ बताकर कहते हैं- ’हे भाषक नाग मेरी जीभ सुरक्षित है, उस पर डस लो।’

वीर तेजा की वचनबद्धता को देखकर भाषक नाग उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहता है- आज के दिन (भाद्रपद शुक्ल दशमी) से पृथ्वी पर कोई भी प्राणी, जो सर्पदंश से पीड़ित होगा, उसे तुम्हारे नाम की तांती बांधने पर जहर का कोई असर नहीं होगा। उसके बाद भाषक नाग घोड़े के पैरों पर से ऊपर चढ़कर तेजा की जीभ पर दंश मारता है। उस दिन से यह परंपरा चली आ रही है।

तेजा का जीवन परिचय (गुरु कौन थे,पत्नी, शादी कब हुई और बाल बच्चे)

Veer Teja Ji Biography : तेजा जी के पिता चौधरी ताहरजी (थिरराज) राजस्थान के नागौर जिले के खरनाल गाँव के मुखिया थे। तेजाजी के नाना का नाम दुलन सोढी था. उनकी माता का नाम सुगना था. मनसुख रणवा ने उनकी माता का नाम रामकुंवरी लिखा है. तेजाजी का ननिहाल त्यौद गाँव (किशनगढ़) में था. तेजाजी के माता-पिता शंकर भगवान के उपासक थे. शंकर भगवान के वरदान से तेजाजी की प्राप्ति हुई. कलयुग में तेजाजी को शिव का अवतार माना गया है. तेजा जब पैदा हुए तब उनके चेहरे पर विलक्षण तेज था जिसके कारण इनका नाम रखा गया तेजा. उनके जन्म के समय तेजा की माता को एक आवाज सुनाई दी – “कुंवर तेजा ईश्वर का अवतार है, तुम्हारे साथ अधिक समय तक नहीं रहेगा. “ तेजाजी के जन्म के बारे में जन मानस के बीच प्रचलित एक राजस्थानी कविता के आधार पर मनसुख रणवा का मत है | तेजा तुम्हारा ससुराल गढ़ पनेर में रायमल्जी के घर है और पत्नी का नाम पेमल है. सगाई ताउजी बख्शा राम जी ने पीला-पोतडा़ में ही करदी थी

तेजा के द्वारा किये गए कृषि से सम्बन्धित महत्व पूर्ण काम |

बचपन में ही उनके साहसिक कारनामों से लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे. कुंवर तेजपाल बड़े हुए. उनके चेहरे की आभा चमकने लगी. वे राज-काज से दूर रहते थे. वे गौसेवा में लीन रहते थे. उन्होंने कृषकों को कृषि की नई विधियां बताई. पहले जो बीज उछाल कर खेत जोता जाता था, उस बीज को जमीन में हल द्वारा ऊर कर बोना सिखाया. फसल को कतार में बोना सिखाया. इसलिए कुंवर तेजपाल को कृषि वैज्ञानिक कहा जाता है. गौसेवा व खेतों में हल जोतने में विशेष रुचि रखते थे. तेजाजी ने ग्यारवीं शदी में गायों की डाकुओं से रक्षा करने में कई बार अपने प्राण दांव पर लगा दिये थे. तेजाजी सत्यवादी और दिये हुये वचन पर अटल रहते थे.

तेजा जी ने समाधी कब और कहाँ ली ?

किशनगढ़ के पास सुरसरा में सर्पदंश से उनकी मृत्यु भाद्रपद शुक्ल 10 संवत 1160, तदनुसार 28 अगस्त 1103 हो गई तथा पेमल ने भी उनके साथ जान दे दी।

तेजाजी का मेला कब और कहा कहा लगता हैं ?

Teja Ji Mela Date Time In Rajasthan :  तेजाजी के निर्वाण दिवस भाद्रपद शुक्ल दशमी को प्रतिवर्ष तेजादशमी के रूप में मनाया जाता है। लोग व्रत रखते हैं। नागौर जिले के परबतसर में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल 10 (तेजा दशमी) से पूर्णिमा तक तेजाजी के विशाल पशु मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें लाखों लोग भाग लेते हैं। वीर तेजाजी को “काला और बाला” का देवता तथा कृषि कार्यों का उपकारक देवता माना जाता है। उनके बहुसंख्यक भक्त जाट जाति के लोग होते हैं। तेजाजी की गौ रक्षक एवं वचनबद्धता की गाथा लोक गीतों एवं लोक नाट्य में राजस्थान के ग्रामीण अंचल में श्रद्धाभाव से गाई व सुनाई जाती है।

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