Jamsetji Nusirwanji Tata biography आधुनिक भारत के निर्माता जमशेदजी टाटा का इतिहास

Nusirwanji Tata biography Jamsetji Nusirwanji Tata Life Jamsetji  Jamsetji Nusirwanji Tata History Jamsetji Nusirwanji Tata Family Biography of Jamsetji Tata Jamsetji Tata Biography About family Jamsetji Nusirwanji Tata was the first industrialist of India to set up the Tata Group, India’s largest alloy company. He was born in a family of Parsi clergy in a small town called Navsari in Gujarat. And later he founded the Tata Group of Companies. Tata is called the “father of Indian industry in India. Jamsetji Tata started doing business at the tender age of 14 at that time he was studying as well as business. In 1858, he joined the college and joined his father’s character organization. When the revolt against the British government of 1857 was new at that time Tata decided to take his business to a summary in such a situation. At that time, the practice of child marriage was quite prevalent, seeing that the great industrialist of the future Jamsetji married 10 year old Hirabai Dabu at the age of 16. भारत के उद्योगपति जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा की जीवनी It was because of his amazing ability to foresee the future that he dreamed of a self-sufficient industrial India. He provided excellent facilities for scientific and technical education and led the nation on the path of becoming a superpower.

Jamsetji Nusirwanji Tata biography भारत के उद्योगपति जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा की जीवनी

Only one of these dreams came true during his lifetime. The major goals of Jamsetji life were opening a steel company setting up a world renowned study center opening a unique hotel and setting up a hydroelectric project. Jamsetji Nusirwanji Tata faced many difficulties during his life, but never gave up in life and always struggled. And they have made a distinct identity in the industry. Today he is called the father of industry. Jamsetji Nusserwanji Tata was an Indian pioneer industrialist who founded the Tata Group, India’s biggest conglomerate company. He was born to a Parsi Zoroastrian family in Navsari then part of the princely state of Baroda.His enterprises were noted for efficiency, for improved labour-protection policies, and for the introduction of finer grades of fibre. He also planned for the Bombay-area hydroelectric power plants that became the Tata Power company in 1906.

Full name Jamsetji Nusserwanji Tata
Date of birth 3 March 1839 
Nationality Indian
Famous Philanthropists Steel.
Died At Age 65 Years 
Sun Sign Pisces 
Famous As Father Of Indian Industry
Family

Spouse/Ex-: Hirabai Daboo

Father: Nusserwanji Tata

Mother: Jeevanbai Tata

Children: Dorabji Tata, Ratanji Tata

Died On Place Of Death 19 May 1904 Bad Nauheim
Founder/Co-Founder Tata Group, Taj Hotels Resorts And Palaces, Tata Sons

भारत के पहले उद्योगपति जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा थे जिन्होंने भारत की सबसे बड़ी मिश्र कंपनी टाटा ग्रुप की स्थापना की थी। उनका जन्म 3 मार्च 1839 गुजरात के नवसारी नाम के छोटे कस्बे में पारसी पादरियों के परिवार में हुआ था। उन के पिता का नाम नुसीरवानजी टाटा और माता का नाम जीवनबाई टाटा. जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा बचपन से ही होनहार बच्चे थे और 14 वर्ष की उम्र में ही व्यपार करने लगे थे | और 16 वर्ष की उम्र में उन की शादी हो गयी हीराबाई दबू के साथ में. जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा का बचपन काफी मुसीबत भरा था उन्होंने बचपन में ही संगर्ष करना सिख लिया था और अपनी सफलता की सीडी पर चड़ते गये और टाटा ग्रुप ऑफ़ कंपनी स्थापना की और भारत की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा ‘टाटा एयरलाइंस’ की शुरुआत की, जो आगे चलकर सन 1946 में ‘एयर इंडिया’ बन गई। इस योगदान के लिए जेआरडी टाटा को भारत के नागरिक उड्डयन का पिता भी कहा जाता है. आज टाटा ग्रुप & कंपनी को शिखर पर पहोचाया और दुनिया में एक नयी पहचान दिलाई। जमशेदजी टाटा भारत के प्रथम महान उद्योगपतियों में से एक माने जाते है। आज उन्ही के योगदानो की वजह से भारतीय उद्योग को विदेश में पहचान मिल पाई।  टाटा को भारत में “भारतीय उद्योग का जनक” भी कहा जाता है। देश के विकास में उनके अतुलनीय योगदान को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने उन्हें उन्हे सन 1955 मे पद्म विभूषण और 1992 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मनित किया। आधुनिक भारत की औद्योगिक बुनियाद रखने वाले उद्योगपतियों में उनका नाम सर्वोपरि है। भारत में इस्पात, इंजीनीयरींग, होट्ल, वायुयान और अन्य उद्योगो के विकास में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

टाटा परिवार को किन किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया

  1. जे.आर.डी. टाटा एक अवैतनिक प्रशिक्षु के रूप में टाटा एंड संस में शामिल हुए
  2. भारत सरकार ने उन्हें एयर इंडिया का अध्यक्ष और इंडियन एयरलाइंस के बोर्ड का निर्देशक नियुक्त किया 1953
  3. फ़्राँस ने उन्हें अपने सर्वोच्‍च नागरकिता पुरस्कार ‘लीजन ऑफ द ऑनर’ से नवाजा 1954
  4. पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया 1955
  5. टाटा कंप्यूटर सेंटर(अब टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) की स्थापना 1968 हुई
  6. टाटा स्टील की स्थापना 1979 की
  7. 26 जुलाई को उन्होंने टाटा समूह के अध्यक्ष का पद छोड़ दिया
  8. देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया
  9. संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत में जनसंख्या नियंत्रण में अहम योगदान देने के लिए उन्हें ‘यूनाइटेड नेशन पापुलेशन आवार्ड’ से सम्‍मानित किया
  10. 34 साल की उम्र में उन्हें टाटा एंड संस का अध्यक्ष चुना गया
  11. 10 फरवरी 1929 को उन्हें भारत में जारी किया गया पहला पायलट लाइसेंस प्राप्त हुआ उन्होंने टाटा एयरलाइंस शुरू की
  12. टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टीआईएसएस) की स्थापना 1936
  13. टाटा मेमोरियल सेंटर फ़ॉर कैंसर रिसर्च एंड ट्रीटमेंट’ की स्‍थापना हुई 1941
  14. टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान की स्थापना 1945
  15. टाटा ने टेल्को प्रारंभ किया 1945
  16. जेआरडी टाटा ने भारत की पहली अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन के रूप में एयर इंडिया इंटरनेशनल का शुभारंभ किया 1948

संस्थापक और टाटा चेयरमैन

  • जमशेदजी एन. टाटा (1887-1904)
  • सर दोराबजी टाटा (1904-1932)
  • सर एन. बी. सकलत्वला (1932-1938)
  • जे. आर. डी. टाटा (1991-2012)
  • साइरस पी मिस्त्री (2012-2016)

एक रोचक सत्य दुनिया में एक अलग पहचान बनाने वाले टाटा परिवार अभी तक बेओलाद रहा हें अगर आज रतन टाटा विवाहित होते और अपनी कोई सन्तान होती तो शायद आज टाटा कंपनी का चेयरमैन होता लेकिन ऐसा नही हुआ क्योंकि अगर ऐसा होता तो इतिहास अपने आप को दोहरा नही पाता आपको जानकर हैरत होगी कि देश के बड़े घरानो में से एक टाटा ग्रुप के फाउनडर चेयरमैन को छोड़कर किसी भी चेयरमैन का कोई वारिस नहीं था | इसलिय ऐसे खानदान पर हर भारतवासी को गर्व हैं और हर भारतवासी उन्हें दिल से सलाम करता हैं

बैंगलूर का इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ साइंस उनके महान सपनों में एक रहा

आरएएम लाला की लिखी यह किताब टाटा घराने के पुरोधा के जीवन का महत्वपूर्ण लेखा-जोखा है। महान लोग अपने समय से कितना आगे की सोचते हैं, इस दस्तावेज के जरिए उनकी मृत्यु की एक सदी बाद यह जानना बहुत दिलचस्प और आश्चर्यजनक लगता है। बैंगलूर का इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ साइंस उनके महान सपनों में एक रहा जिसकी स्थापना के लिए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन से खटपट चलती रही पर आखिरकार उसे मंजूरी देनी ही पड़ी। भारत के भविष्य के लिए राजनीति और शिक्षा में भी उनकी गहन रुचि रही। जहां से कई प्रतिभाशाली वैज्ञानिक निकले। मुंबई का विश्वप्रसिद्ध ताजमहल होटल, जमशेदपुर का स्टील कारखाना उनके समय में ही बन चुके थे हालांकि इनकी शुरुआत और जबर्दस्त कामयाबी देखने के लिए उनकी उम्र के खाते में और वक्त नहीं बचा था। He provided good services not only to the workers but also to their children, and facilities like accident compensation, pension. They also used to give work training to their workers. It was Jamsetji Tata who appealed to the Japanese steam navigation company to reduce freight. Because freight had the highest impact on Jamsetji earnings

जमशेदजी टाटा की स्वामी विवेकानन्द से भेंट

जमशेदजी टाटा के साथ स्वामी विवेकानन्द का प्रथम साक्षात्कार उस समय हुआ, जब वह एक साधारण संन्यासी के रूप में बिना किसी परिचय पत्र के अमेरिका में आयोजित ‘शिकागो धर्मसभा में भाग लेने जा रहे थे। जापान के इयाकोहामा से वह जिस जहाज़ से यात्रा कर रहे थे उसमें जमशेदजी टाटा भी थे। स्वामीजी ने जमशेदजी से कहा कि वे क्यों जापान से दियासलाई ख़रीद कर अपने देश में बेचते हैं और जापान को पैसा देते हैं। इसमें लाभांश तो कोई ख़ास होता नहीं। इससे अच्छा तो यही होता कि अपने ही देश में दियासलाई का कारखाना होता। इससे उन्हें लाभ भी काफ़ी होता, दस लोगों का भरण-पोषण भी होता और देश का रुपया देश में ही रह जाता। लेकिन जमशेदजी ने उनको विभिन्न प्रकार की असुविधाओं की जानकारी देकर उनसे असहमति जाहिर की। उन दिनों टाटा की जापानी दियासलाई की देश में अत्यधिक माँग थी। 30 वर्ष का एक अनजान युवा साधु जमशेदजी जैसे एक विख्यात व्यवसायी को उपदेश दे रहा हो, यह घटना आश्चर्यजनक होते हुए भी स्वामीजी के प्रभावकारी व्यक्तित्व की तस्वीर प्रस्तुत करती है, क्योंकि अन्य जगहों की तरह यहाँ भी स्वामीजी को किसी परिचय पत्र की आवश्यकता कदापि नहीं हुई। इस संदर्भ में परवर्तिकाल में जमशेदजी ने सिस्टर निवेदिता से कहा था कि- स्वामीजी जब जापान में थे तब जो कोई उन्हें देखता बुद्ध से उनका सादृश्य पाकर आश्चर्यचकित रह जाता था। इसके बाद जमशेदजी से स्वामीजी की भेंट फिर कब एवं कहाँ हुई, इस संदर्भ में ऐसा कहा जाता है कि स्वामीजी जब जापान में दियासलाई का कारखाना देखने गये थे, तब जमशेदजी से उनका प्रथम परिचय हुआ। स्वामी विवेकानन्द जमशेदजी के इस प्रस्ताव के बहुत ही आग्रही थे। वह व्याकुलता से अपने जीवन स्वप्न को रूपायित होते देखना चाह रहे थे। वह जानते थे कि इस देश का उत्थान केवल कृषि से ही संभव नहीं है, बल्कि औद्योगिकीकरण की भी आवश्यकता है। वह देश में शिल्प उद्योगों की स्थापना करना चाहते थे। वह सन्न्यासियों का एक दल बनाकर इस कार्य को आगे बढ़ाना चाहते थे, ताकि देश की जनता की आर्थिक दशा सुधरे। अमेरिका भारत में प्रचार के लिए धर्म शिक्षकों को न भेजकर शिल्प शिक्षकों को भेजे, आधुनिक भारतवर्ष में सामाजिकता एवं शिल्प शिक्षा की आवश्यकता है, ऐसा स्वामीजी ने अमेरिका में कहा था। हो सकता है कि स्वामीजी ने अपनी यात्रा के दौरान देश हितैषी व्यवसायी जमशेदजी को भारत में शिल्प-शिक्षा प्रदान करने की अपनी कल्पना से पूर्णरूपेण अवगत कराया हो और उसी के प्रभाव से जमशेदजी ने रिसर्च इंस्टीट्यूट खोलने की परिकल्पना की हो

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