अनंत चौदस 4 सितम्बर 2017 आज होगा गणपति बप्पा की प्रतिमा का विसर्जन

Ganesh Vishrjan 2017 Today Latest News Update : दस दिनों से चले आ रहे गणेश चतुर्थी का उत्सव आज पूरा होने जा रहा हैं | आज पूरी साज सज्जा के साथ गणपति बप्पा की मूर्ति का  विसर्जन किया जायेगा | सबसे पहले 10:22 पर गणपति बप्पा मोरिया की पूजा की जाएगी व् उसके बाद गणेशजी को तिल के लड्डुओं का भोग लगाया जायेगा और फिर गाजे बाजे के साथ गणपतिजी की झांकी निकली जाएगी और फिर गणेशजी की प्रतिमा का विसर्जन किया जायेगा|

गणपति बप्पा की प्रतिमा का विसर्जन आज 4 सितम्बर 2017 को

गणेश चतुर्थी 2017 : गणेश चतुर्थी उत्सव हमारे देश मैं बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता हैं | गणेश चतुर्थी का उत्सव महाराष्ट्र मैं बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता हैं मराठी गणेश चतुर्थी बड़ी ही रोमांचक होती हैं यहाँ लोग कई दिनों पहले से तैयारी मैं जुट जाते हैं और जोर शोर से गणेश चतुर्थी उत्सव का आयोजन करते हैं |

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गणेश चतुर्थी कब हैं ?

गणेश चतुर्थी 2017 : गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी का त्यौहार शुक्रवार, 25 अगस्त 2017 को हैं । यह शुक्ल चतुर्थी (चौथा चंद्र दिवस) पर भाद्रप्रदा के महीने में आती है और अनंत चतुर्दशी (चौदहवें चंद्र दिवस) पर समाप्त होती है।

गणेश चतुर्थी का शुभ मुहर्त 

ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल, अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है।

गणेश चतुर्थी पूजा शुभ मुहर्त समय :

मध्याह्न गणेश पूजा का समय = 10:22 से 12:54
अवधि = 2 घण्टे 31 मिनट
25 अगस्त को, चन्द्रमा को नहीं देखने का समय = 08:23 से 20:36
अवधि = 12 घण्टे 13 मिनट

गणेश चतुर्थी का महत्व

माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी संकट या संकटा चौथ कहलाती है। इसे वक्रतुंडी चतुर्थी, माही चौथ, तिल अथवा तिलकूट चतुर्थी व्रत भी कहते हैं।मंगलमूर्ति और प्रथम पूज्य भगवान गणेश को संकटहरण भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस चतुर्थी के दिन व्रत रखने और भगवान गणेश की पूजा करने से जहां सभी कष्ट दूर हो जाते हैं वहीं इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति भी होती है। इस दिन तिल दान करने का महत्व होता है। इस दिन गणेशजी को तिल के लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। शास्त्रों के मुताबिक देवी-देवताओं में सर्वोच्च स्थान रखने वाले विघ्न विनाशक भगवान गणेश की पूजा-अर्चना जो लोग नियमित रूप से करते हैं, उनकी सुख-समृद्घि में बढ़ोतरी होती है।

उज्जैन के पंडित आनंद शंकर व्यास ने बताया कि यह चतुर्थी संक्रांति के आसपास आती है। चूंकि यहीं से सभी शुभ कार्य शुरू होते हैं इसलिए गणेशजी की उपासना का भी सबसे ज्यादा महत्व है। उन्होंने कहा कि सामग्री न भी हो तो सच्चे मन से की गई किसी भी देवता की आराधना का फल अवश्य मिलता है।

गणेश चतुर्थी पूजा विधि और सामग्री

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भगवान गणेश की गणेश-चतुर्थी के दिन सोलह उपचारों से वैदिक मन्त्रों के जापों के साथ पूजा की जाती है। भगवान की सोलह उपचारों से की जाने वाली पूजा को षोडशोपचार पूजा कहते हैं। गणेश-चतुर्थी की पूजा को विनायक-चतुर्थी पूजा के नाम से भी जाना जाता है। भगवान गणेश को प्रातःकाल, मध्याह्न और सायाह्न में से किसी भी समय पूजा जा सकता है। परन्तु गणेश-चतुर्थी के दिन मध्याह्न का समय गणेश-पूजा के लिये सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। मध्याह्न के दौरान गणेश-पूजा का समय गणेश-चतुर्थी पूजा मुहूर्त कहलाता है।

पूजा के लिए जरूरी सामग्री गणपति की मूर्ति को घर में स्‍थापित करने के समय सभी विधि विधान के अलावा जिन सामग्री की जरूरत होती है, वो इस प्रकार हैं। जैसे लाल फूल, दूर्वा, मोदक, नारियल, लाल चंदन, धूप और अगरबत्‍ती।

गणेश चतुर्थी पूजा विधि : गणेश चतुर्थी के दिन ब्रह्म मूहर्त में उठकर स्नान आदि से शुद्ध होकर शुद्ध कपड़े पहनें। आज के दिन लाल रंग के वस्त्र पहनना अति शुभ होता है। गणपति का पूजन शुद्ध आसन पर बैठकर अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की तरफ करके करें।पंचामृत से श्री गणेश को स्नान कराएं तत्पश्चात केसरिया चंदन, अक्षत, दूर्वा अर्पित कर कपूर जलाकर उनकी पूजा और आरती करें। उनको मोदक के लड्डू अर्पित करें। उन्हें रक्तवर्ण के पुष्प विशेष प्रिय हैं। श्री गणेश जी का श्री स्वरूप ईशाण कोण में स्थापित करें और उनका श्री मुख पश्चिम की ओर रहे।संध्या के समय गणेश चतुर्थी की कथा, गणेश पुराण, गणेश चालीसा, गणेश स्तुति, श्रीगणेश सहस्रनामावली, गणेश जी की आरती, संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें। अंत में गणेश मंत्र ‘ ऊं गणेशाय नम:’ अथवा ‘ऊं गं गणपतये नम: का अपनी श्रद्धा के अनुसार जाप करें।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

श्री गणेश चतुर्थी व्रत को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलन में है कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थें. वहां देवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय व्यतीत करने के लिये चौपड खेलने को कहा. भगवान शंकर चौपड खेलने के लिये तो तैयार हो गये. परन्तु इस खेल मे हार-जीत का फैसला कौन करेगा ?

इसका प्रश्न उठा, इसके जवाब में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बना, उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा कर दी. और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते है. परन्तु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है. इसलिये तुम बताना की हम मे से कौन हारा और कौन जीता | यह कहने के बाद चौपड का खेल शुरु हो गया. खेल तीन बार खेला गया, और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गई. खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिये कहा गया, तो बालक ने महादेव को विजयी बताया. यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई. और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगडा होने व किचड में पडे रहने का श्राप दे दिया. बालक ने माता से माफी मांगी और कहा की मुझसे अज्ञानता वश ऎसा हुआ, मैनें किसी द्वेष में ऎसा नहीं किया. बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा की, यहां गणेश पूजन के लिये नाग कन्याएं आयेंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऎसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगें, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई |

ठिक एक वर्ष बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं | नाग कन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालुम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया. उसकी श्रद्वा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए. और श्री गणेश ने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिये कहा. बालक ने कहा की है विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए, कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वो यह देख प्रसन्न हों | बालक को यह वरदान दे, श्री गणेश अन्तर्धान हो गए. बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. और अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. उस दिन से पार्वती जी शिवजी से विमुख हो गई. देवी के रुष्ठ होने पर भगवान शंकर ने भी बालक के बताये अनुसार श्री गणेश का व्रत 21 दिनों तक किया. इसके प्रभाव से माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी. वह समाप्त होई |

यह व्रत विधि भगवन शंकर ने माता पार्वती को बताई. यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई. माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया. व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें. उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत माना जाता है.

मराठी गणेश चतुर्थी 

असे म्हणतात की या चतुर्थीच्या दिवशीच श्री गणेश सर्व भक्तांसाठी पृथ्वीवर अवतरले.असे मानले जाते की गजमुख असलेला श्रीगणेश म्हणजे सर्व प्रकारची बुद्धीमत्ता,ऐश्वर्य आणि सौभाग्य मिळवून देणारा देव आणि शिव पार्वतीचा पुत्र आहे.श्रीगणेशाच्या या रुपामागे गहन अर्थ दडलेला आहे.

तो अजम् आहे म्हणजेच ज्याचा जन्म झाला नाही असा,तो निराकार आहे म्हणजेच आकार रहित आहे आणि निर्विकल्प म्हणजेच विकल्प नसलेला असा आहे.तो सर्वत्र असलेल्या चेतेनेचे प्रतिक आहे.गणेशामुळेच हे ब्रह्मांड आहे.ज्याच्यामुळे सर्व गोष्टींना आकार मिळतो आणि अशी ऊर्जा आहे ज्यात सारे विश्व सामावलेले आहे.गणेश बाहेर मूर्तीत नसून तो आपल्या जीवनाच्या केंद्रस्थानी आहे.पण हे अतिशय सूक्ष्म ज्ञान आहे.प्रत्येक निराकार गोष्ट साकार रूप घेऊ शकत नाही हे आपल्या प्राचीन ऋषी मुनींना हे माहित होते.सामान्य जनतेला हे समजावे म्हणून त्यांनी त्या निराकार श्रीगणेशाला साकार रूप दिले.बराच काळ साकार रूपाचा अनुभव घेतल्यानंतर त्यांना निराकाराचा अनुभव येऊ लागतो.

अशाप्रकारे निराकार गणेशाला आदी शंकराचार्यांनी आपल्या प्रार्थनेतून आकार दिला आणि निराकार गणेशाचा संदेशही दिला.अशाप्रकारे आकार हाच आरंभीचा बिंदू आहे जो निराकार चेतनेपर्यंत पोहोचवतो.गणेश चतुर्थीच्या दिवशी विविध रूपात गणेशाची पूजा केली जाते.या मूर्ती तयार करणे ही एक अद्वितीय अशी कला आहे ज्यातून निराकारापर्यंत पोहोचता येते.गणेश स्तोत्रातही गणेशाच्या स्तुतीपर वर्णनात हेच सांगितले आहे.आपण आपल्या चेतनेतील श्री गणेशाची प्रार्थना करतो की त्याने आपल्यासमोर मूर्तीच्या रूपात यावे जेणे करुन आपण काही काळ त्याच्याशी रममाण होऊन शकू,हसत खेळत संवाद साधू शकू.ठराविक दिवसांनतर त्यांची प्रार्थना करतो की ते जिथून आले तिथे म्हणजे आपल्या चेतनेत त्यांनी निघून जावे.आपण गणेशाच्या मूर्तीची प्रतिष्ठापना करून त्याची पूजा करतो म्हणजे त्याच्याकडूनच मिळालेल्या गोष्टी आपण त्यालाच अर्पण करत असतो.

ठराविक दिवसांनंतर मूर्तीचे विसर्जन केले जाते.यातून आपल्याला हे कळते की ईश्वर मूर्तीमध्ये नाही.तो तर आपल्यातच आहे.अशा प्रकारे सर्वव्यापी असलेल्या ईश्वराला साकार रुपात अनुभवणे आणि त्याचा आनंद घेणे हीच गणेश चतुर्थी मागची मूळ भावना आहे.गणेश चतुर्थी म्हणजे उत्सव आणि पूजा तसेच उत्साह आणि भक्तीचा समन्वय आहे.श्री गणेश हा आपल्यातील अनेक चांगल्या गुणांचा देव आहे.आपण जेंव्हा त्याची पूजा करतो तेंव्हा ते गुण आपल्यातही खुलू लागतात.जिथे जडता असेल तिथे ना ज्ञान असते ना बुद्धी असते ना प्रगती.त्यामुळे चेतनेला जागृत करणे आणि चेतनेचा अधिकार जाणणे म्हणजेच गणेश आहे.आपल्यातील हीच चेतना जागृत व्हावी म्हणूनच प्रत्येक पूजेच्या आधी गणेशाची पूजा केली जाते.

गणेश प्रतिमा का विसर्जन 2017

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गणेश विसर्जन गणेश चतुर्थी के त्यौहार के 11 वें दिन पर पानी में गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन है। गणेश विसर्जन अनंत चतुर्दशी पर त्यौहार के अंत में किया जाने वाला अनुष्ठान समारोह है। 2017 में, गणेश विसर्जन 5 सितंबर को किया जाएगा। इस दिन, लाखों से भी अधिक मूर्तियाँ हर साल पानी में विसर्जित की जाती है। कुछ लोग अनंत चतुर्दशी से कुछ दिनों पहले गणेश विसर्जन करते हैं। रीति रिवाजों और परंपराओं के अनुसार 2017 में गणपति विसर्जन तिथियाँ निम्नलिखित हैं –

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