नवरात्र 2018 कैसे करे नवरात्र में नौ देवियों की पूजा और पूजा करने की विधि

पुराणों के अनुसार महानवरात्रि की पूजा की परम्परा सनातन काल से ही चली आ रही है | नवरात्रि के 9 दिनों में देवी दुर्गा के 9 रूपों की पूजा की जाती है | देवी माता के नौ रूप जो इस प्रकार है | शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री है | महानवरात्रि पूजन के साथ ही नवग्रह (नौ ग्रहों ) जैसे सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहू और केतु की भी शांति होती है | आश्विन माह के नवरात्रि के दौरान भगवान राम की पूजा भी की जाती है | अश्विन मास की नवरात्रि को शारदीय नवरात्र भी कहा जाता  हैं | कहा गया है की माता की भक्ति अगर श्रद्धापूर्वक की जाती है तो उस पर माता की कृपा अवस्य हो जाती है व मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं |

श्लोक में नवदुर्गा के नाम क्रमश: दिये गए हैं |

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति. चतुर्थकम्।।पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।सप्तमं कालरात्रीति.महागौरीति चाष्टमम्।।नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।

Navratri Day and Date 2018

Pratipada Navratri Day        Wednesday      10 Oct 2018

Dwitiya  Navratri Day           Thursday          11 Oct 2018

Tritiya  Navratri Day             Friday               12 Oct 2018

Chaturthi Navratri Day       Saturday           13 Oct 2018

Panchami  Navratri Day     Sunday             14 Oct 2018

Sasthi   Navratri Day         Monday             15 Oct 2018

Saptami  Navratri Day      Tuesday             16 Oct 2018

Ashtami  Navratri Day      Wednesday        17 Oct 2018

Navami   Navratri Day      Thursday            18 Oct 2018

नवरात्रि के दिनों में देवी माता के नौ रूपों की पूजा-विधि

प्रथम दिन देवी शैलपुत्री की पूजा

शैलपुत्री

 

नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस को शैलपुत्री नामक देवी की पूजा अर्चना की जाती है | पर्वतराज हिमालय के तप से प्रसन्न होकर आद्या शक्ति उनके यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई और इनके पूजन के साथ नवरात्र का शुभारंभ होता है |

माता दुर्गा को शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। पर्वतराज हिमालय से उत्तपन पुत्री का नामकरण शैलपुत्री के रूप में हुआ | शैलपुत्री का वाहन वृषभ है | इसलिए इसे वृषारूढ़ा देवी के नाम से भी जाना जाता है  |शैलपुत्री के दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल विराज मान है | शैलपुत्री प्रथम दुर्गा हैं यह सती के नाम से भी जानी जाती है |

बहुत दिनों पहले की बात है की एक प्रजापति ने यज्ञ करवाया था | उस यज्ञ में सभी देवताओ को बुलाया गया था लेकिन भगवान शंकर को नहीं बुलाया गया था | सती यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं भगवान शंकर ने कहा की सभी देवताओ को बुलाया गया है परन्तु मुझे नहीं ऐसे में वाहा जाना सही नहीं होगा | सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी सती जब घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया | बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे | और भगवान शंकर के प्रति हिन् भावना दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे | इस पर सती को ढेस पहुंचा | वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया। इस दुख से व्यथित होकर भगवान शंकर ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं | शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है। पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं|
वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

दिवतीय दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा

माता ब्रह्मचारिणी

 

नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती की कठिन तपस्या से तीनों लोक उनके समक्ष नतमस्तक हो गए | देवी का यह रूप तपस्या के तेज से ज्योतिर्मय है | इनके दाहिने हाथ में मंत्र जपने की माला तथा बाएं में कमंडल है| ब्रह्मचारिणी माता ने कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा

चंद्रघंटा

 

माता दुर्गा तीसरा नाम चंद्रघंटा है । नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है | और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधन करनी चाहिए। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है दस हाथ हैं वे खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं| इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। इसलिए हमें चाहिए कि मन, वचन और कर्म के साथ ही काया को विहित विधि-विधान के अनुसार परिशुद्ध-पवित्र करके चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना करनी चाहिए। इससे सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। यह देवी कल्याणकारी है।

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा

माता कूष्मांडा

 

नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन अदाहत चक्र में अवस्थित होता है। ऐसी मान्यता है कि इनकी हंसी से ही ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ था| अष्टभुजी माता कूष्मांडा के हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, अमृत-कलश, चक्र तथा गदा है|  इनके आठवें हाथ में मनोवांछित फल देने वाली जपमाला है | इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं| विधि-विधान से पूजा करने पर भक्त को कम समय में ही कृपा का सूक्ष्म भाव अनुभव होने लगता है। यह देवी आधियों-व्याधियों से मुक्त करती हैं और उसे सुख समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं। अंततः इस देवी की उपासना में भक्तों को सदैव तत्पर रहना चाहिए|

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे।

पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा

स्कंदमाता

 

नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की पूजा अर्चना दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। इस देवी की चार भुजाएं हैं | देवी के एक पुत्र कुमार कार्तिकेय (स्कंद) हैं, जिन्हें देवासुर-संग्राम में देवताओं का सेनापति बनाया गया था | इस रूप में देवी अपने पुत्र स्कंद को गोद में लिए बैठी होती हैं | नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बायीं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। स्कंदमाता अपने भक्तों को शौर्य प्रदान करती हैं| शास्त्रों में इसका पुष्कल महत्व बताया गया है। इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। भक्त को मोक्ष मिलता है। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज और कांतिमय हो जाता है। अतः मन को एकाग्र रखकर और पवित्र रखकर इस देवी की आराधना करने वाले भक्त को भवसागर पार करने में कठिनाई नहीं आती है।

सिंहसनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥

माता दुर्गा का छठवां रूप कात्यायनी की पूजा

माता कात्यायनी

 

नवरात्रि के छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा अर्चना की जाती है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य है। यह स्वर्ण के समान चमकीली हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। दायीं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। मां के बाँयी तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है | कात्यायन ऋषि की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर माता भगवती उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुई और कात्यायनी कहलाई | कात्यायनी का अवतरण महिषासुर वध के लिए हुआ था|  यह देवी अमोघ फलदायिनी हैं|  भगवान कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने देवी कात्यायनी की आराधना की थी | जिन लडकियों की शादी न हो रही हो या उसमें बाधा आ रही हो वे कात्यायनी माता की उपासना कर सकती है |

चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

सातवाँ दिन माता कालरात्रि की पूजा

माता कालरात्रि

 

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना की जाती  है। यह देवी अपने हाथों में लोहे का कांटा तथा खड्ग (कटार) भी लिए हुए हैं|  इनके भयानक स्वरूप को देखकर विध्वंसक शक्तियां पलायन कर जाती हैं | इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। इस देवी के तीन नेत्र हैं। यह तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। यह गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो। कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥ वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

आठवां दिन महागौरी की पूजा

महागौरी

 

माता दुर्गा का आठवा रूप महागौरी है आठवे दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है। चतुर्भुजी माता वृषभ पर विराजमान हैं | इनके दो हाथों में त्रिशूल और डमरू है | अन्य दो हाथों द्वारा वर और अभय दान प्रदान कर रही हैं | भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए भवानी ने अति कठोर तपस्या की तब उनका रंग काला पड गया था | भगवान शिवजी ने गंगाजल द्वारा इनका अभिषेक किया तो यह गौरवर्ण की हो गई इसीलिए इन्हें गौरी कहा जाता है | यह अमोघ फलदायिनी हैं |  और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कल्मष धुल जाते हैं। पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। महागौरी का पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं।

श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया॥

नौवे दिन सिद्धिदात्री की पूजा

सिद्धिदात्री

 

नवरात्री के अंतिम दिन नवमी को भगवती के सिद्धिदात्री स्वरूप का पूजन किया जाता है|  इनकी अनुकंपा से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं| अन्य देवी-देवता भी मनोवांछित सिद्धियों की प्राप्ति की कामना से इनकी आराधना करते हैं|  मां सिद्धिदात्री चतुर्भुजी हैं|  अपनी चारों भुजाओं में वे शंख, चक्र, गदा और पद्म (कमल) धारण किए हुए हैं|  कुछ धर्मग्रंथों में इनका वाहन सिंह बताया गया है, परंतु माता अपने लोक प्रचलित रूप में कमल पर बैठी (पद्मासना) दिखाई देती हैं| सिद्धिदात्री की पूजा से नवरात्र में नवदुर्गा पूजा का अनुष्ठान पूर्ण हो जाता है|

भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से यह तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए थे | बताया जाता है की हिमाचल के नंदापर्वत पर इनका प्रसिद्ध तीर्थ है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियां होती हैं।

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