Guru Purnima Poem Dohe Essay in Hindi English गुरु पूर्णिमा पर कविता, दोहा, निबंध, गुरु महिमा

Guru Purnima Dohe in English Guru Mahima Kabir Dohe Rahim Dohe on guru Purnima Guru Purnima Dohe in Hindi Guru Purnima Essay Guru Purnima Speech in English Guru Purnima everyone listens to the Guru songs. He composes poetry for the Students School and those who are near the Guru feet sing Guru Mahima. Guru place in India precedes that of God. Therefore on the day of Guru Purnima a special festival is celebrated as that festival and a celebration of the qualities of the Guru. This Year Guru Purnima celebrated on 5 July 2020. हमारे यहाँ एक कहावत बोलते हैं की गुरु बिन ज्ञान नही गुरु के बिना जिन्दगी का कोई मोल नही | इस लिये अपने जीवन में एक गुरु होना जरुरी हैं हम ये नहीं कहते की केवल आध्यात्मिक गुरु होता हैं | हर मोड़ पर व्यक्ति के  जीवन में अनेक गुरु आते हैं जैसे स्कूल में पढ़ाने वाला गुरु होता जो हमें शिक्षा देता उसी प्रकार हमारे माता पिता भी हमारे गुरु होते जो हमें जीने का डंग सीकाते  हैं इस प्रकार हर वो व्यक्ति जो हमें कुछ जान देता हैं जिस के कारण हमारी जिंदगी स्राथक होती हैं वो सब गुरु के जैसे हैं पौराणिक काल से ही गुरु ज्ञान के प्रसार के साथ-साथ समाज के विकास का बीड़ा उठाते रहे हैं। गुरु शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है- ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान) एवं ‘रु’ का अर्थ होता है प्रकाश (ज्ञान)। गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं। शास्त्रों में गुरु का महत्त्व बहुत ऊँचा है। गुरु की कृपा के बिना भगवान् की प्राप्ति असंभव है। जिनके दर्शन मात्र से मन प्रसन्न होता है, अपने आप धैर्य और शांति आ जाती हैं, वे परम गुरु हैं। जिनकी रग-रग में ब्रह्म का तेज व्याप्त है, जिनका मुख मण्डल तेजोमय हो चुका है, उनके मुख मण्डल से ऐसी आभा निकलती है कि जो भी उनके समीप जाता है वह उस तेज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।

Guru Purnima Poem Dohe Essay in Hindi English 2020 गुरु पूर्णिमा पर कविता दोहा निबंध गुरु महिमा

गुरु का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है। गुरु हमें शिक्षा देते हैं। गुरु जिन्हें हम आचार्य , अध्यापक और टीचर के नाम से भी  जानते हैं, हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं। एक सभ्य समाज का निर्माण करने में गुरु का बहुत बड़ा योगदान होता है। गुरु का स्थान तो भगवान से’ भी बड़ा होता है। कबीर जी ने भी अपने दोहों में भी अकसर गुरु की महिमा का गान किया है। गुरु की महानता देखते हुए ही आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। आइये पढ़ते हैं गुरु को समर्पित “ गुरु महिमा के दोहे

गुरु अमृत है जगत में, बाकी सब विषबेल,

सतगुरु संत अनंत हैं, प्रभु से कर दें मेल|

गुरु को नित वंदन करो, हर पल है गुरूवार

गुरु ही देता शिष्य को, निज आचार-विचार ।

गीली मिट्टी अनगढ़ी, हमको गुरुवर जान,

ज्ञान प्रकाशित कीजिए, आप समर्थ बलवान।

गुरु है त्रिदेवो के समान

गुरु है गंगा ज्ञान की, करे अज्ञान का नाश

ब्रम्हा-विष्णु-महेश सम, काटे भाव का पाश ।

गुरु के बिना मनुष्य अज्ञानी

गुरु बिन ज्ञान न होत है, गुरु बिन दिशा अजान

गुरु बिन इन्द्रिय न सधें, गुरु बिन बढ़े न शान।

गुरु पूर्णिमा पर कविता

स्वयं का शिक्षक बनकर स्वयं को शिक्षा देना ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान हैं |

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हैं जीवन बेसुरा !

संगीत सुर ओ साज मिल जाए !

मुझे हर तख्त मिल जाए !

मुझे हर ताज मिल जाए !

मिले दोलत ज़माने की !

खजाना दो जंहा भर का !

अगर कुछ धुल गुरु-चरणों की !

मुझको आज मिल जाए !


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गुरु को नित वंदन करो, हर पल है गुरूवार.

गुरु ही देता शिष्य को, निज आचार-विचार

विधि-हरि-हर, परब्रम्ह भी, गुरु-सम्मुख लघुकाय.

अगम अमित है गुरु कृपा, कोई नहीं पर्याय

गुरु है गंगा ज्ञान की, करे पाप का नाश.

ब्रम्हा-विष्णु-महेश सम, काटे भाव का पाश

गुरु भास्कर अज्ञान तम्, ज्ञान सुमंगल भोर.

शिष्य पखेरू कर्म कर, गहे सफलता कोर

गुरु-चरणों में बैठकर, गुर जीवन के जान

ज्ञान गहे एकाग्र मन, चंचल चित अज्ञान

गुरुता जिसमें वह गुरु, शत-शत नम्र प्रणाम.

कंकर से शंकर गढ़े, कर्म करे निष्काम

गुरु पल में ले शिष्य के, गुण-अवगुण पहचान.

दोष मिटा कर बना दे, आदम से इंसान

गुरु-चरणों में स्वर्ग है, गुरु-सेवा में मुक्ति.

भव सागर-उद्धार की, गुरु-पूजन ही युक्ति

माटी शिष्य कुम्हार गुरु, करे न कुछ संकोच.

कूटे-साने रात-दिन, तब पैदा हो लोच

कथनी-करनी एक हो, गुरु उसको ही मान.

चिन्तन चरखा पठन रुई, सूत आचरण जान

शिष्यों के गुरु एक है, गुरु को शिष्य अनेक.

भक्तों को हरि एक ज्यों, हरि को भक्त अनेक

गुरु तो गिरिवर उच्च हो, शिष्य ‘सलिल’ सम दीन.

गुरु-पद-रज बिन विकल हो, जैसे जल बिन मीन

ज्ञान-ज्योति गुरु दीप ही, तम् का करे विनाश.

लगन-परिश्रम दीप-घृत, श्रृद्धा प्रखर प्रकाश

गुरु दुनिया में कम मिलें, मिलते गुरु-घंटाल.

पाठ पढ़ाकर त्याग का, स्वयं उड़ाते माल

गुरु-गरिमा-गायन करे, पाप-ताप का नाश.

गुरु-अनुकम्पा काटती, महाकाल का पाश

विश्वामित्र-वशिष्ठ बिन, शिष्य न होता राम.

गुरु गुण दे, अवगुण हरे, अनथक आठों याम

गुरु खुद गुड़ रह शिष्य को, शक्कर सदृश निखार.

माटी से मूरत गढ़े, पूजे सब संसार

गुरु की महिमा है अगम, गाकर तरता शिष्य.

गुरु कल का अनुमान कर, गढ़ता आज भविष्य..

गुरु की जय-जयकार कर, रसना होती धन्य.

गुरु पग-रज पाकर तरें, कामी क्रोधी वन्य..

रु से भेद न मानिये, गुरु से रहें न दूर.

गुरु बिन ‘सलिल’ मनुष्य है, आँखें रहते सूर

टीचर-प्रीचर गुरु नहीं, ना मास्टर-उस्ताद.

गुरु-पूजा ही प्रथम कर, प्रभु की पूजा बाद..

गुरु पूर्णिमा के दोहे—-

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय

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गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि ।

बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि॥

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शब्द गुरु का शब्द है, काया का गुरु काय।

भक्ति करै नित शब्द की, सत्गुरु यौं समुझाय॥

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शिल्पी छैनी से करे, सपनों को साकार !

अनपढ़ पत्थर से रचे, मनचाहा आकार !!

माटी रख कर चाक पर, घड़ा घड़े कुम्हार !!

श्रेष्ट गुरु मिल जाए तो, शिष्य पाय संस्कार !!

चादर रंगदे रंग में, सुगुणी गुरु रंगरेज !

ज्यूं ज्यूं प्रक्षालन करे, बढे शिष्य का तेज !!

गोविन्द के आशीर्वाद से, शिष्य परम पद पाए !!

गुरु के सम हरि न गिनुं, तज डारु में राम!

ऐसी श्रध्दा जो रखे, उनके संवरे काम !!

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श्रेष्ठ गुरु संसार में, विश्वामित्र – वशिष्ठ !

गुरु – कृपा से रामजी, बने जगत के इष्ट !!

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मिल गए गुरु संदीपनी, ली उनसे आशीष !

ग्वाले ने गीता रची क्रष्ण जगदीश !!

गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाए

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‘ॐ सहनावतु सह नौ भुनत्तु सहवीर्यं करवावहै,

तेजस्विनां धीतमस्तु मा विद्विषावहै |

ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविः ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतं |

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना |

ॐ शान्तिः | शान्तिः || शान्तिः |||’

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हे गुरुदेव !

गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम ||

!आपके साथ मेरी श्रद्धा की डोर कभी टूटने न पाये ||

प्रभु करे कि प्रभु के नाते आपके साथ हमारा हमेशा गुरु-शिष्य का सम्बंध बना रहे ||

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करता करे ना कर सके, गुरु करे सब होय।

सात द्वीप नौ खंड में गुरु से बड़ा ना कोय।।

मैं तो सात संमुद्र की मसीह करु, लेखनी सब बदराय।

सब धरती कागज करु पर, गुरु गुण लिखा ना जाय।।

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई!

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गुरु होता सबसे महान;

जो देता है सबको ज्ञान;

आओ इस गुरु पूर्णिमा पर करें अपने गुरु को प्रणाम।

गुरु पूर्णिमा की शुभ कामनायें

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तुमने सिखाया उंगली पकड़ कर हमें चलना;

तुमने बताया कैसे गिरने के बाद संभलना;

तुम्हारी वजह से आज हम पहुंचे इस मुक़ाम पे;

गुरु पूर्णिमा के दिन करते हैं आभार सलाम से।

गुरु पूर्णिमा की शुभ कामनायें!

गुरु पूर्णिमा के सन्देश

कितने ही कर्म करो, कितनी ही उपासनाएँ करो, कितने ही व्रत और अनुष्ठान करो, कितना ही धन इकट्ठा कर लो और् कितना ही दुनिया का राज्य भोग लो लेकिन जब तक सदगुरु के दिल का राज्य तुम्हारे दिल तक नहीं पहुँचता, सदगुरुओं के दिल के खजाने तुम्हारे दिल तक नही उँडेले जाते, जब तक तुम्हारा दिल सदगुरुओं के दिल को झेलने के काबिल नहीं बनता, तब तक सब कर्म, उपासनाएँ, पूजाएँ अधुरी रह जाती हैं। देवी-देवताओं की पूजा के बाद भी कोई पूजा शेष रह जाती है किंतु सदगुरु की पूजा के बाद कोई पूजा नहीं बचती।

गुरु पूर्णिमा के अनमोल वचन

अक्षर ज्ञान ही नहीं,

गुरु ने सिखाया जीवन ज्ञान,

गुरुमंत्र को कर आतमसात,

हो जाओ भबसागर से पार!

शुभ गुरु पुर्णिमा!

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ईश कृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान ।

ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान ॥

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मान पुडी़ है जहर की, खाये सो मर जाये ।

चाह उसी की राखता, वह भी अति दुःख पाय॥

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Guru Purnima speech in English 2020

Guru Purnima is celebrated by conducting diverse programs and special cultural performances by various organizations and Samarohas. As part of the celebration, devotees present gifts in form of sweets and flowers to their spiritual gurus. It’s an ideal time to commence spiritual lessons from a guru. Farmers give great significance to this day because it is believe that the advent of much-needed rains will shower upon their crops and plantations. A Puja’ is kept by all spiritual aspirants of Vyasa in honor of his divine personage. By tradition, from this day the spiritual seekers begin to strengthen their spiritual sadhana. The period of Chaturmas four months’ starts from this day, Long-ago, wandering spiritual gurus and their followers settled down at one place and studied on the Brahma Sutras composed by Vyasa and used to engage themselves in Vedantic debates.

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