मंगला गौरी व्रत पूजन विधि कहानी और महत्व

श्रावण के महीने में मंगला गौरी का व्रत सौभाग्यवती स्त्रिया प्रतेक मंगलवार को करती है | यह अखण्ड सौभाग्य का वरदान होता है | श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को किए जाने वाला यह व्रत देवी गौरी या मंगलागौरी के नाम से प्रसिद्ध है | जिस प्रकार माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने हेतु कठोर तपस्या की थी उसी प्रकार स्त्रियां इस व्रत को करके अपने पति की लम्बी आयु का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं | वैसे तो श्रावण के महीने में सोमवार को शिव की पूजा करना अच्‍छा होता है किंतु श्रावण माह में किया जाने वाला सोमवार का व्रत अधिक महत्व वाला और फलदायी माना जाता है। इस व्रत का आरंभ 11 जुलाई से हुआ है ।

मंगला गौरी की कथा Mangla Gauri Katha

प्राचीन काल में धर्मपाल नामक सेठ अपनी पत्नी के साथ एक नगर में सुख पूर्वक जीवन यापन करता था | सेठ धर्मपाल के किसी चीज की कमी नहीं थी | परन्तु उसके कोई संतान नहीं थी | यह बात उसे हमेश सताती थी | पुत्र प्राप्ति के लिए सेठ बहुत दान पुण्य किया करता था |उसके अच्छे कार्यो के लिए भगवान् की कृपा से उसके एक पुत्र प्राप्त हुआ | उसका पुत्र सोलहवें वर्ष की आयु में सांप के डसने से मृत्यु हो जाएगी | यह उसकी कुंडली में लिखा था |अपने पुत्र की कम आयु जानकर उसके पिता को बहुत ठेस पहुंची | अत: उस सेठ ने सब कुछ भगवान के भरोसे छोड़ दिया और कुछ समय पश्चात अपने पुत्र का विवाह एक योग्य संस्कारी कन्या से कर दिया | सौभाग्य से उस कन्या की माता सदैव मंगला गौरी के व्रत का पूजन किया करती थी| अत: इस व्रत के प्रभाव से उत्पन्न कन्या को अखंड सौभाग्यवती होने का आशिर्वाद प्राप्त था जिसके परिणाम स्वरुप सेठ के पुत्र की दिर्घायु प्राप्त हुई |

मंगला गौरी की पूजन विधि | Mangla Gauri Pujan Vidhi

फल, फूलों की मालाएं, लड्डू, पान, सुपारी, इलायची, लोंग, जीरा, धनिया (सभी वस्तुएं सोलह की संख्या में होनी चाहिए), साडी सहित सोलह श्रंगार की 16 वस्तुएं, 16 चूडियां इसके अतिरिक्त पांच प्रकार के सूखे मेवे 16 बार सात प्रकार के धान्य होने चाहिए | व्रत का आरंभ करने वाली महिलाओं को श्रावण मास के प्रथम मंगलवार के दिन इन व्रतों का संकल्प सहित प्रारम्भ करना चाहिए | श्रावण मास के प्रथम मंगलवार की सुबह स्नान आदि से निर्वत होने के बाद मंगला गौरी की मूर्ति या फोटो को लाल रंग के कपडे से लिपेट कर लकडी की चौकी पर रखा जाता है|

इसके बाद गेंहूं के आटे से एक दीया बनाया जाता है | इस दीये में 16-16 तार कि चार बतियां कपडे की बनाकर रखी जाती है| सबसे पहले श्री गणेश जी का पूजन किया जाता है |  पूजन में श्री गणेश पर जल, रोली, मौली, चन्दन, सिन्दूर, सुपारी, लोंग, पान,चावल, फूल, इलायची, बेलपत्र, फल, मेवा और दक्षिणा चढाते हैं | इसके पश्चात कलश का पूजन भी श्री गणेश जी की पूजा के समान ही किया जाता है| फिर नौ ग्रहों तथा सोलह माताओं की पूजा की जाती है|चढाई गई सभी सामग्री ब्राह्माण को दे दी जाती है|

मंगला गौरी की प्रतिमा को जल, दूध, दही से स्नान करा, वस्त्र आदि पहनाकर रोली, चन्दन, सिन्दुर, मेंहन्दी व काजल लगाते है |श्रंगार की सोलह वस्तुओं से माता को सजाया जाता हैं| सोलह प्रकार के फूल- पत्ते माला चढाते है| फिर मेवे, सुपारी, लौग, मेंहदी, चूडियां चढाते है| अंत में मंगला गौरी व्रत की कथा सुनी जाती हैं |कथा सुनने के बाद विवाहित महिला अपनी सास तथा ननद को सोलह लड्डु देती हैं |इसके बाद यही प्रसाद ब्राह्मण को भी दिया जाता है| अंतिम व्रत के दूसरे दिन बुधवार को देवी मंगला गौरी की प्रतिमा को नदी या पोखर में विर्सिजित कर दिया जाता हैं| इस व्रत को लगातार पांच वर्षों तक किया जाता हैं|इसके पश्चात इस व्रत का उद्धापन कर देना चाहिए. देवी गौरी सभी की मनोकामना पूर्ण करें |

 

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