क्या हैं अमरनाथ गुफा का इतिहास ? जानिए अमरनाथ यात्रा का रहस्य और शिव अमर कथा Amarnath temple history

Amarnath ka mandir Amarnath temple history अमरनाथ टेम्पल हिस्ट्री Amarnath temple story Lord Shiva is considered as a living God. He has three places of His residence first and the foremost is Kailash Parvat, second one is Lohit Giri under which flows the Brahamputra and third one is Muzwan Parvat. Lord Shiva has been mentioned in the hymns of Rig Veda. Even in ancient India, Lord Shiva was worshiped and it is evident from the Mohinjodaro and Harappa findings. One of the prominent religious destinations dedicated to Lord Shiva is the holy Amarnath Cave that is located in Jammu Kashmir. The Amarnath Cave has a special significance in the Hindu religion. As per legend, Lord Shiva had chosen this cave to describe the secrets of immortality and formation of the universe to Maa Parvati. The Shiva lingam of the Amarnath cave is called ‘Amareshwar’. According to mythological belief, this cave was first discovered by Bhrigu Rishi. Since then this place is the center of Shiva worship and travel.

अमरनाथ गुफा का इतिहास जानिए अमरनाथ यात्रा का रहस्य और शिव अमर कथा Amarnath temple history

अमरनाथ यात्रा : अमरनाथ हिन्दुओ का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में 135 किलो मीटर दूर समुद्रतल से 13600 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इस गुफा की लंबाई (भीतर की ओर गहराई) 19 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। गुफा 11 मीटर ऊँची है | अमरनाथ गुफा भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है क्यों कि यहीं पर भगवान शिव ने माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। इस यात्रा करने पर मनुष्य के सभी पापा दूर होते हैं मोक्ष की प्राप्ति होती हैं | जब भगवान ने माता पार्वती के साथ इस गुफा में प्रवेश से पहले सब कुछ त्याग दिया था और फिर गुफा में अमर कथा सुनाई थी | यह यात्रा सावन माह में चलती हैं पुरे महीने में यात्रियों का तांता लगा रहता हैं |वर्ष 2019 में यात्रा बीच में रोक दी गयी थी | क्यों की धारा 370 हटाने के वजह से किसी की जान को खतरा न हो इस लिये अमर नाथ यात्रा बीच में रोकनी पड़ी लेकिन अब यह यात्रा फिर से शुरू हो चुकी हैं और आजाद भारत में पहली बार एक देश एक कानून लागु होने के बाद पहली यात्रा जुलाई 2020 से शुरू होने वाली हैं | आतंकवाद का इतना डर होने के बाद भी कभी यह यात्रा नही रोकी | और भक्तो में किसी प्रकार का डर वह भय नही मिलता भगवान भजन करते करते यात्रा का लुप्त उठाते हैं |

Amarnath ka mandir

अमरनाथ गुफा मैं बर्फ से निर्मित शिवलिंग

यहाँ की प्रमुख विशेषता पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखो लोग यहां आते है। गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूँदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूँदों से लगभग दस फुट लंबा शिवलिंग बनता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। आश्चर्य की बात यही है कि यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है, जबकि गुफा में आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो हाथ में लेते ही भुरभुरा जाए। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग अलग हिमखंड हैं।

अमरनाथ गुफा का इतिहास :

पुराणों में संस्मरण है कि एक बार मां पार्वती ने बड़ी उत्सुकता के साथ महादेव से यह प्रश्न किया कि ऐसा क्यूं होता है कि आप अजर अमर हैं और मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर फिर से वर्षो की कठोर तपस्या के बाद आपको प्राप्त करना होता है। इस प्रश्न पर भगवान शिव ने कहा हे देवी आप इस संसारिक मोह माया से ऊपर ध्यान योग कर के अपने आप को पंचतत्व से मुक्त होकर अमर हो सकते हो फिर आप को बार बार धरती पर जन्म नही लेना पड़ेगा | अगर आप के मन जब तक योग सीखने जिज्ञासा उत्पन नही होगी तब तक आप अमर नही हो सकते हैं माँ पार्वती ने कई दिनों तक योग का अभ्यास की और भगवान शिव के पास गयी और बोली मुझे अब आप एक गुरु बन कर शिक्षा प्रधान करे | तब भगवान ने उन्हें अमर कथा सुनाने का निश्चय किया और अमर कंध की गुफाओं  में चले गये और आगे कथा नीचे दी गयी हैं |

Amarnath mandir Story

शिव अमर कथा

जब मुझे आपको ही प्राप्त करना है तो फिर मेरी यह तपस्या क्यूं? मेरी इतनी कठोर परीक्षा क्यूं? और आपके कंठ में पड़ी यह परमुण्ड माता तथा आपके अमर होने का कारण व रहस्य क्या है? महाकाल ने पहले तो माता को यह गूढ़ रहस्य बताना उचित नहीं समझा परन्तु माता की स्त्री हठ के आगे उनकी एक न चली। तब महादेव शिव को मां पार्वती को अपनी साधना की अमर कथा, जिसे हम अमरत्व की कथा के रूप में जानते हैं, इसी परम पावन अमरनाथ की गुफा में कही। भगवान शंकर ने मां पार्वती जी से एकान्त व गुप्त स्थान पर अमर कथा सुनने को कहा, जिससे कि अमर कथा को कोई भी जीव, व्यक्ति और यहां तक कोई पशु-पक्षी न सुन लें, क्योंकि जो कोई भी इस अमर कथा को सुन लेता, वह अमर हो जाता। इस कारण शिव जी मां पार्वती को लेकर किसी गुप्त स्थान की ओर चल पड़े। सबसे पहले भगवान भोले ने अपनी सवारी नंदी को पहलगाम पर छोड़ दिया, इसलिए बाबा अमरनाथ की यात्रा पहलगाम से शुरू करने का तात्पर्य या बोध होता है।

आगे चलने पर शिव जी ने अपनी जटाओं में चन्द्रमा को चंदनवाड़ी में अलग कर दिया और गंगा जी को पंचतरणी में और कंठाभूषण सर्पो को शेषनाग पर छोड़ दिया। इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा। आगे की यात्रा में अगला पड़ाव गणेश टाप पड़ता है, इस स्थान पर बाबा ने अपने पुत्र गणेश को भी छोड़ दिया था, जिसको महागुणा का पर्वत भी कहा जाता है। पिस्सू घाटी में पिस्सू नामक कीड़े को भी त्याग दिया। इस प्रकार महादेव ने अपने पीछे जीवनदायिनी पांचों तत्वों को भी अपने से अलग कर दिया। इसके साथ मां पार्वती संग एक गुप्त गुफा में प्रवेश कर गए। कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर प्रवेश कर अमर कथा को न सुने, इसलिए शिव जी ने अपने चमत्कार से गुफा के चारों ओर आग प्रज्जवलित कर दी। फिर शिव जी ने जीवन की अमर कथा मां पार्वती को सुनाना शुरू किया। कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गई, जिसका शिव जी को पता नहीं चला।

भगवान शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे। इस समय दो सफेद कबूतर श्री शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे, शिव जी को लग रहा था कि मां पार्वती कथा सुन रही है और बीच-बीच में हुंकार भर रही हैं। इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली। कथा समाप्त होने पर शिव का ध्यान पार्वती मां की ओर गया जो सो रही थी। शिव जी ने सोचा कि अगर पार्वती सो रही है, तब इसे सुन कौन रहा था। तब महादेव की दृष्टि कबूतरों पर पड़ी। महादेव शिव कबूतरों पर क्रोधित हुए और उन्हें मारने के लिए तत्पर हुए। इस पर कबूतरों ने शिव जी से कहा कि हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है, यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी। इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आर्शीवाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप में निवास करोगे।

अत: यह कबूतर का जोड़ा अजय अमर हो गया। माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है। इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा पड़ा। जहां गुफा के अंदर भगवान शंकर बर्फ के निर्मित शिवलिंग के रूप में विराजमान है। पवित्र गुफा में मां पार्वती के अलावा गणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के दर्शन किए जा सकते हैं।

अमरनाथ गुफा की खोज : अमरनाथ गुफा की खोज से जुड़ी रोचक कहानी

16वीं सदी में इस गुफा की खोज हुई थी। गुफा की खोज को लेकर कई कहानियां प्रचल‌ित हैं परंतु सबसे प्रचलित कहानी एक गड़रिये की है। घाटी में रहने वाले बूटा मलिक नामक एक मुस्ल‌िम गड़रिये को किसी दिव्य पुरूष ने कोयले से भरा हुआ थैला दिया था। थैले को लेकर जब वह घर पहुंचा तो थैले में उसे कोयले के स्थान पर सोने के सिक्के मिले।
खुशी के मारे वह दौड़ता हुआ उसी स्थान पर गया जहां उसे दिव्य पुरूष मिले थे। उस स्थान पर पहुंचकर बूटा मलिक को वह दिव्य पुरूष नहीं मिले परंतु यह गुफा और शिवलिंग मिला। इस खोज का श्रेय इस मुस्ल‌िम गड़र‌िए को जाता है। आज भी चढ़ावे का चौथाई उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है।

अमरनाथ यात्रा

अमर नाथ यात्रा पर जाने के भी दो रास्ते हैं। एक पहलगाम होकर और दूसरा सोनमर्ग बलटाल से। यानी कि पहलमान और बलटाल तक किसी भी सवारी से पहुँचें, यहाँ से आगे जाने के लिए अपने पैरों का ही इस्तेमाल करना होगा। अशक्त या वृद्धों के लिए सवारियों का प्रबंध किया जा सकता है। पहलगाम से जानेवाले रास्ते को सरल और सुविधाजनक समझा जाता है। बलटाल से अमरनाथ गुफा की दूरी केवल 14 किलोमीटर है और यह बहुत ही दुर्गम रास्ता है और सुरक्षा की दृष्टि से भी संदिग्ध है। इसीलिए सरकार इस मार्ग को सुरक्षित नहीं मानती और अधिकतर यात्रियों को पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन रोमांच और जोखिम लेने का शौक रखने वाले लोग इस मार्ग से यात्रा करना पसंद करते हैं। इस मार्ग से जाने वाले लोग अपने जोखिम पर यात्रा करते है। रास्ते में किसी अनहोनी के लिए भारत सरकार जिम्मेदारी नहीं लेती है।

अमरनाथ यात्रा का महत्व :

अमरनाथ यात्रा का करने का बहुत ही बड़ा महत्व हैं कहा जाता हैं की जो इन्सान अपने जीवन मैं चार धाम (यमुनोत्री,गंगोत्री,केदारनाथ,बद्रीनाथ) की यात्रा नहीं क र पाता हैं उसका जीवन व्यर्थ हैं अथार्थ जो आदमी अमरनाथ की यात्रा कर लेता हैं,शिव भोले उसकी मुक्ति निश्चित करता हैं इसलिए हमे जीवन मैं एक बार चार धाम की यात्रा करनी चाहिए |

जम्मू कश्मीर से  हटायी धारा 370 एक देश एक कानून  की नीती पर कार्य करेगा  भारत सरकार अमरनाथ यात्रा  के दोरान रहने वाला आतंकवाद का डर अब जड़ से खत्म

भारत को दीमक की तरह खोखला किये जा रही धारा 370 जिस के कारण आतंकवाद पैदा होता हैं | हर साल यात्रा के दोरान आतंकी हमला होना यात्रियों ने डर सा रहता था | लेकिन तत्काल बीजेपी सरकार ने एक कड़ा कदम उठाते हुये तत्काल ग्रहमंत्री अमितशाह ने धारा 370 का विखंडन करते हुये हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया गया हैं | श्रीनगर अमरनाथ यात्रियों पर सोमवार रात आतंकी हमला हुआ है। ये हमला यात्रियों की बस पर किया गया। इस हमले में 7 अमरनाथ यात्रियों की मौत हो गई जबकि 15 श्रद्धालु घायल हो गए हैं। हमले के बाद अनंतनाग में जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर ट्रैफिक रोक दिया गया है। इस ट्रैफिक में अमरनाथ यात्रा से जुड़े वाहन भी हैं। बताया जाता है कि आतंकियों ने छिपकर फायरिंग की। अमरनाथ यात्रियों से भरी एक बस बाल्टाल से मीर बाजार की तरफ जा रही थी। इसी दौरान आतंकियों ने श्रद्धालुओं की बस पर फायरिंग करनी शुरू कर दी। 2 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई जबकि 5 लोगों की अस्पताल ले जाते वक्त मौत हो गई। इस हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। जिस बस पर ये आतंकी हमला हुआ है वो श्राइन बोर्ड में रजिस्टर्ड नहीं है। यानी इस बस के साथ कितनी सुरक्षा व्यवस्था थी इसकी जांच की जा रही है।

अमरनाथ गुफा की खोज से जुड़ा रहस्य

कहानी एक गड़रिये की : 16वीं सदी में इस गुफा की खोज हुई थी। गुफा की खोज को लेकर कई कहानियां प्रचल‌ित हैं परंतु सबसे प्रचलित कहानी एक गड़रिये की है। घाटी में रहने वाले बूटा मलिक नामक एक मुस्ल‌िम गड़रिये को किसी दिव्य पुरूष ने कोयले से भरा हुआ थैला दिया था। थैले को लेकर जब वह घर पहुंचा तो थैले में उसे कोयले के स्थान पर सोने के सिक्के मिले। खुशी के मारे वह दौड़ता हुआ उसी स्थान पर गया जहां उसे दिव्य पुरूष मिले थे। उस स्थान पर पहुंचकर बूटा मलिक को वह दिव्य पुरूष नहीं मिले परंतु यह गुफा और शिवलिंग मिला। इस खोज का श्रेय इस मुस्ल‌िम गड़र‌िए को जाता है। आज भी चढ़ावे का चौथाई उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है।

कबूतरों का रहस्य : अमरनाथ गुफा में बर्फ के श‌िवल‌िंग के बाद कबूतरों के एक जोड़े की उपस्थ‌ित‌ि भी एक तरह रहस्य है। कोई नहीं जाना क‌ि ये जोड़ा क‌ितना पुराना है। इस जोड़े के लेकर एक प्रस‌िद्ध कथा भी प्रचल‌ित है। जब भगवान श‌िव पार्वती को अमरकथा सुना रहे थे तब उस गुफा में एक कबूतर का जोड़ा भी उपस्थ‌ित था ज‌िसने वह पूरी कथा स‌ुनी और हमेशा के ल‌िए अमर हो गया। माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है। इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा पड़ा।

श‌िवल‌िंग से जुड़ा अद्भुद सच : पव‌ित्र गुफा में बनने वाले श‌िवल‌िंग या ह‌िमल‌िंग के बनने की कहानी क‌िसी चमत्कार से कम नहीं है। आज तक व‌िज्ञान भी ह‌िमल‌िंग के बनने की गुत्थी नहीं सुलझा पाई है। इस शिवलिंग का निर्माण गुफा की छत से पानी की बूंदों के टपकने से होता है। पानी के रुप में ग‌िरने वाली बूंदे इतनी ठंडी होती है कि नीचे गिरते ही बर्फ का रुप लेकर ठोस हो जाती है। यह क्रम लगातार चलता रहता है और बर्फ का 12 से 18 फीट तक ऊंचा शिवलिंग बन जाता है।जिन प्राकृतिक स्थितियों में इस शिवलिंग का निर्माण होता है वह विज्ञान के तथ्यों से विपरीत है। विज्ञान के अनुसार बर्फ को जमने के लिए करीब शून्य डिग्री तापमान जरुरी है लेक‌िन अमरनाथ यात्रा के समय इस स्थान का तापमान शून्य से उपर होता है।

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