Annapurna Vrat Katha in Hindi Annapurna Mata Jayanti 2020 Date Puja Time Puja Vidhi Pujan Samagri Arti अन्नपूर्णा माता की कथा व्रत कहानी आरती पूजन विधि

Annapurna Mata Ki Katha Arti Hindi Me Annapurna Jayanti 2020 Date Time Puja Shubh Muhurat Annapurna Vrat Katha in Hindi Annapurna Mata Jayanti Puja Vidhi Pujan Samagri : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक बार जब पृथ्वी पर अन्न की कमी हो गयी थी | तब मां पार्वती ने अन्न की देवी, मां अन्नपूर्णा के रूप में प्रगट होकर पृथ्वी लोक पर अन्न उपलब्ध कराकर समस्त मानव जाति की रक्षा की थी | हिंदू धर्म में घर की गृहणी को भी अन्नपूर्णा का स्थान दिया जाता है | माता अन्नपूर्णा से ही धरती पर अन्न की पूर्ति होती है | इसलिए अन्नपूर्णा माता का स्थान रसोईघर में माना जाता है |

हिंदू धर्म में अन्नपूर्णा जयंती का व्रत व पूजा-पाठ किया जाता है | इस लेख में आप अन्नपूर्णा जयंती की सम्पूर्ण कथा पूजा विधि पूजन सामग्री व आरती Annapurna Jayanti 2020 Date Time Puja Shubh Muhurat Annapurna Mata Ki Katha Arti Annapurna Vrat Katha Puja Vidhi Pujan Samagri लेकर आये है | ध्यान रहे इस दिन घर की महिलाओं या अन्न का अपमान भूलकर भी नहीं करना चाहिए | जानते हैं आइये जानते है अन्नपूर्णा जयंती की सम्पूर्ण कथा पूजा विधि पूजन सामग्री व आरती के बारे में |

Annapurna Vrat Katha Kahani Puja Vidhi Pujan Samagri Arti

Maa Annapurna Jayanti 2020 Date Time

हिन्दू पंचांग/कैलेंडर के अनुसार अन्नपूर्णा जयंती मार्गशीष (अगहन) मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है | इस वर्ष यानि 2020 में 30 दिसंबर, बुधवार को अन्नपूर्णा जयंती मनाई जाएगी | अन्नपूर्णा जयंती तिथि अर्थात मार्गशीष मास की पूर्णिमा तिथि 29 दिसम्बर को शुरू होगी और 30 दिसम्बर को समाप्त होगी | इस पेज को स्क्रॉल कर Annapurna Jayanti 2020 Puja Shubh Muhurat Pujan Vidhi Vrat Katha के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकते है |

अन्नपूर्णा जयंती पूजा का शुभ मुहूर्त Annapurna Jayanti Pujan Time 2020

माँ अन्नपूर्णा को प्रसन्न करने के लिए शुभ समय में पूजन-पाठ करना चाहिए है | और पुरे विधि विधान से माँ अन्नपूर्णा की कथा व पूजा करनी चाहिए | हिन्दू पंचांग के अनुसार अन्नपूर्णा जयंती तिथि अर्थात मार्गशीष मास की पूर्णिमा तिथि 29 दिसम्बर को सुबह 7 बजकर 54 मिनट से शुरू होगी और अगले दिन 30 दिसम्बर को सुबह 8 बजकर 57 मिनट पर समाप्त होगी | इस बिच माँ अन्नपूर्णा का पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है यह आप निचे देख सकते है |

Annapurna Jayanti 2020 Puja Shubh Muhurat

Annapurna Jayanti Labha – Gain Pujan Shubh Muhurat07:07 AM to 08:26 AM
Maa Annapurna Amrita – Best Pujan Time08:26 AM to 09:44 AM
Mata Annapurna – Good Puja Ka Shubh Muhurat11:02 AM to 12:21 PM
Annapurna Jayanti Chara – Neutral Pujan Time02:57 PM to 04:16 PM
Maa Annapurna Labha – Gain Pujan Shubh Muhura04:16 PM to 05:34 PM
Mata Annapurna Shubha – Good Puja Ka Shubh Muhurat07:16 PM to 08:58 PM
Annapurna Jayanti Amrita – Best Pujan Time08:58 PM to 10:39 PM
Maa Annapurna Chara – Neutral Pujan Shubh Muhurat10:39 PM to 12:21 AM, Dec 31
Annapurna Jayanti Labha – Gain Puja Ka Shubh Muhurat03:44 AM to 05:26 AM, Dec 31
Annapurna Jayanti Vrat Katha Kahani अन्नपूर्णा माता की कथा

बान्धवा शिव भक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् | एक समय की बात है | काशी निवासी धनंजय की पत्नी का नाम सुलक्षणा था | उसे अन्य सब सुख प्राप्त थे, केवल निर्धनता ही उसके दुःख का कारण थी | यह दुःख उसे हर समय सताता था | एक दिन सुलक्षणा पति से बोली- स्वामी! आप कुछ उद्यम करो तो काम चले | इस प्रकार कब तक काम चलेगा ? सुलक्षण्णा की बात धनंजय के मन में बैठ और वह उसी दिन विश्वनाथ शंकर जी को प्रसन्न करने के लिए बैठ गया और कहने लगा- हे देवाधिदेव विश्वेश्वर ! मुझे पूजा-पाठ कुछ आता नहीं है, केवल तुम्हारे भरोसे बैठा हूँ | इतनी विनती करके वह दो-तीन दिन भूखा-प्यासा बैठा रहा |

यह देखकर भगवान शंकर ने उसके कान में ‘अन्नपूर्णा ! अन्नपूर्णा!! अन्नपूर्णा!!!’ इस प्रकार तीन बार कहा | यह कौन, क्या कह गया ? इसी सोच में धनंजय पड़ गया कि मन्दिर से आते ब्राह्मणों को देखकर पूछने लगा- पंडितजी ! अन्नपूर्णा कौन है ? ब्राह्मणों ने कहा- तू अन्न छोड़ बैठा है, सो तुझे अन्न की ही बात सूझती है | जा घर जाकर अन्न ग्रहण कर | धनंजय घर गया, स्त्री से सारी बात कही, वह बोली-नाथ! चिंता मत करो, स्वयं शंकरजी ने यह मंत्र दिया है | वे स्वयं ही खुलासा करेंगे | आप फिर जाकर उनकी आराधना करो | धनंजय फिर जैसा का तैसा पूजा में बैठ गया |। रात्रि में शंकर जी ने आज्ञा दी | कहा- तू पूर्व दिशा में चला जा | वह अन्नपूर्णा का नाम जपता जाता और रास्ते में फल खाता, झरनों का पानी पीता जाता |

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इस प्रकार कितने ही दिनों तक चलता गया | वहां उसे चांदी सी चमकती बन की शोभा देखने में आई | सुन्दर सरोवर देखने में या, उसके किनारे कितनी ही अप्सराएं झुण्ड बनाए बैठीं थीं | एक कथा कहती थीं | और सब ‘मां अन्नपूर्णा’ इस प्रकार बार-बार कहती थीं | यह अगहन मास की उजेली रात्रि थी और आज से ही व्रत का ए आरम्भ था | जिस शब्द की खोज करने वह निकला था, वह उसे वहां सुनने को मिला | धनंजय ने उनके पास जाकर पूछा- हे देवियो ! आप यह क्या करती हो? उन सबने कहा हम सब मां अन्नपूर्णा का व्रत करती हैं | व्रत करने से गई पूजा क्या होता है? यह किसी ने किया भी है? इसे कब किया जाए? कैसा व्रत है में और कैसी विधि है? मुझसे भी कहो |

वे कहने लगीं- इस व्रत को सब कोई कर सकते हैं | इक्कीस दिन तक के लिए 21 गांठ का सूत लेना चाहिए | 21 दिन यदि न बनें तो एक दिन उपवास करें, यह भी न बनें तो केवलकथा सुनकर प्रसाद लें | निराहार रहकर कथा कहें, कथा सुनने वाला कोई न मिले तो पीपल के पत्तों को रख सुपारी या गुवारपाठ वृक्ष को सामने कर दीपक को साक्षी कर सूर्य, गाय, तुलसी या महादेव को बिना कथा सुनाए मुख में दाना न डालें | यदि भूल से कुछ पड़ जाए तो एक दिवस फिर उपवास करें | व्रत के दिन क्रोध न करें और झूठ न बोलें | धनंजय बोला- इस व्रत के करने से क्या होगा ? वे कहने लगीं- इसके करने से अन्धों को नेत्र मिले, लूलों को हाथ मिले, निर्धन के घर धन आए, बांझी को संतान मिले, मूर्ख को विद्या आए, जो जिस कामना से व्रत करे, मां उसकी इच्छा पूरी करती है |

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वह कहने लगा- बहिनों! मेरे भी धन नहीं है, विद्या नहीं है, कुछ भी तो नहीं है, मैं तो दुखिया ब्राह्मण हूँ, मुझे इस व्रत का सूत दोगी? हां भाई तेरा कल्याण हो, तुझे देंगी, ले इस व्रत का मंगलसूत ले | धनंजय ने व्रत किया | व्रत पूरा हुआ, तभी सरोवर में से 21 खण्ड की सुवर्ण सीढ़ी हीरा मोती जड़ी हुई प्रकट हुई | धनंजय जय ‘अन्नपूर्णा’ ‘अन्नपूर्णा’ कहता जाता था | इस प्रकार कितनी ही सीढि़यां उतर गया तो क्या देखता है कि करोड़ों सूर्य से प्रकाशमान अन्नपूर्णा का मन्दिर है, उसके सामने सुवर्ण सिंघासन पर माता अन्नपूर्णा विराजमान हैं | सामने भिक्षा हेतु शंकर भगवान खड़े हैं | देवांगनाएं चंवर डुलाती हैं | कितनी ही हथियार बांधे पहरा देती हैं | धनंजय दौड़कर जगदम्बा के चरणों में गिर गया | देवी उसके मन का क्लेश जान गईं |

धनंजय कहने लगा- माता! आप तो अन्तर्यामिनी हो | आपको अपनी दशा क्या बताऊँ ? माता बोली – मेरा व्रत किया है, जा संसार तेरा सत्कार करेगा | माता ने धनंजय की जिह्नवा पर बीज मंत्र लिख दिया | अब तो उसके रोम-रोम में विद्या प्रकट हो गई | इतने में क्या देखता है कि वह काशी विश्वनाथ के मन्दिर में खड़ा है | मां का वरदान ले धनंजय घर आया | सुलक्षणा से सब बात कही | माता जी की कृपा से उसके घर में सम्पत्ति उमड़ने लगी | छोटा सा घर बहुत बड़ा गिना जाने लगा | जैसे शहद के छत्ते में मक्खियां जमा होती हैं, उसी प्रकार अनेक सगे सम्बंधी आकर उसकी बड़ाई करने लगे | कहने लगे-इतना धन और इतना बड़ा घर, सुन्दर संतान नहीं तो इस कमाई का कौन भोग करेगा? सुलक्षणा से संतान नहीं है, इसलिए तुम दूसरा विवाह करो |

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अनिच्छा होते हुए भी धनंजय को दूसरा विवाह करना पड़ा और सती सुलक्षणा को सौत का दुःख उठाना पड़ा | इस प्रकार दिन बीतते गय फिर अगहन मास आया | नये बंधन से बंधे पति से सुलक्षणा ने कहलाया कि हम व्रत के प्रभाव से सुखी हुए हैं | इस कारण यह व्रत छोड़ना नहीं चाहिए | यह माता जी का प्रताप है | जो हम इतने सम्पन्न और सुखी हैं | सुलक्षणा की बात सुन धनंजय उसके यहां आया और व्रत में बैठ गया | नयी बहू को इस व्रत की खबर नहीं थी | वह धनंजय के आने की राह देख रही थी | दिन बीतते गये और व्रत पूर्ण होने में तीन दिवस बाकी थे कि नयी बहू को खबर पड़ी |। उसके मन में ईष्र्या की ज्वाला दहक रही थी | सुलक्षणा के घर आ पहुँची ओैर उसने वहां भगदड़ मचा दी | वह धनंजय को अपने साथ ले गई | नये घर में धनंजय को थोड़ी देर के लिए निद्रा ने आ दबाया |

इसी समय नई बहू ने उसका व्रत का सूत तोड़कर आग में फेंक दिया | अब तो माता जी का कोप जाग गया | घर में अकस्मात आग लग गई, सब कुछ जलकर खाक हो गया | सुलक्षणा जान गई और पति को फिर अपने घर ले आई | नई बहू रूठ कर पिता के घर जा बैठी | पति को परमेश्वर मानने वाली सुलक्षणा बोली- नाथ ! घबड़ाना नहीं | माता जी की कृपा अलौकिक है | पुत्र कुपुत्र हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती | अब आप श्रद्धा और भक्ति से आराधना शुरू करो | वे जरूर हमारा कल्याण करेंगी | धनंजय फिर माता के पीछे पड़ गया | फिर वहीं सरोवर सीढ़ी प्रकट हुई, उसमें ‘ मां अन्नपूर्णा’ कहकर वह उतर गया | वहां जा माता जी के चरणों में रुदन करने लगा | माता प्रसन्न हो बोलीं-यह मेरी स्वर्ण की मूर्ति ले, उसकी पूजा करना, तू फिर सुखी हो जायेगा, जा तुझे मेरा आशीर्वाद है |

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तेरी स्त्री सुलक्षणा ने श्रद्धा से मेरा व्रत किया है, उसे मैंने पुत्र दिया है | धनंजय ने आँखें खोलीं तो खुद को काशी विश्वनाथ के मन्दिर में खड़ा पाया | वहां से फिर उसी प्रकार घर को आया | इधर सुलक्षणा के दिन चढ़े और महीने पूरे होते ही पुत्र का जन्म हुआ | गांव में आश्चर्य की लहर दौड़ गई | मानता आने लगा | इस प्रकार उसी गांव के निःसंतान सेठ के पुत्र होने पर उसने माता अन्नपूर्णा का मन्दिर बनवा दिया, उसमें माता जी धूमधाम से पधारीं, यज्ञ किया और धनंजय को मन्दिर के आचार्य का पद दे दिया |

जीविका के लिए मन्दिर की दक्षिणा और रहने के लिए बड़ा सुन्दर सा भवन दिया | धनंजय स्त्री-पुत्र सहित वहां रहने लगा | माता जी की चढ़ावे में भरपूर आमदनी होने लगी | उधर नई बहू के पिता के घर डाका पड़ा, सब लुट गया, वे भीख मांगकर पेट भरने लगे | सुलक्षणा ने यह सुना तो उन्हे बुला भेजा, अलग घर में रख लिया और उनके अन्न-वस्त्र का प्रबंध कर दिया | धनंजय, सुलक्षणा और उसका पुत्र माता जी की कृपा से आनन्द से रहने लगे | माता जी ने जैसे इनके भण्डार भरे वैसे सबके भण्डार भरें |

Annapurna Mata Ki Puja Vidhi अन्नपूर्णा जयंती पूजा विधि
  • अन्नपूर्णा जयंती के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्यक्रम से निवर्त होकर स्नान इत्यादि कर साफ़ वस्त्र धारण करे |
  • सूर्य को जल अर्पित कर व्रत और पूजा का संकल्प लें |
  • अन्नपूर्णा माता के पूजा स्थल को साफ कर गंगाजल का छिड़काव कर लें |
  • अन्नपूर्णा जयंती के दिन स्नान से पूर्व रसोईघर की अच्छे से सफाई कर लें और गंगाजल व गुलाबजल का छिड़काव करें |
  • अब जिस चूल्हे पर आपको भोजन बनाना है उस पर हल्दी, कुमकुम, चावल, पुष्प, धूप और दीपक से पूजन करे |
  • इसके बाद मां अन्नापूर्णा की प्रतिमा या तस्वीर को किसी चौकी पर स्थापित कर एक सूत का धागा लेकर उसमें 17 गांठे लगा लें | और उस धागे पर चंदन और कुमकुम लगाकर मां अन्नापूर्णा की तस्वीर के समक्ष रख दें |
  • इसके बाद 10 दूर्वा और 10 अक्षत अर्पित करें |
  • अब मां अन्नापूर्णा की धूप व दीप आदि से विधिवत पूजा करें और अन्नापूर्णा माता से प्रार्थना करें कि, हे मां मुझे धन, धान्य, पशु पुत्र, आरोग्यता ,यश आदि सभी कुछ दें |
  • इसके बाद पुरुष इस धागे को दाएं हाथ की कलाई पर और महिला इस धागे को बाएं हाथ की कलाई पर पहन लें |
  • अब Annapurna Mata Ki Katha Kahani सुने |
  • माँ अन्नापूर्णा को प्रसाद का भोग लगाएं और 17 हरे धान के चावल और 16 दूर्वा लेकर मां अन्नापूर्णा की प्रार्थना करें और कहें, हे आप तो सर्वशक्तिमयी हैं, इसलिए सर्वपुष्पयी ये दूर्वा आपको समर्पित है |
  • इसके बाद किसी निर्धन व्यक्ति या ब्राह्मण को अन्न का दान अवश्य करें |
Annapurna Mata Ki Aarti माँ अन्नापूर्णा की आरती

बारम्बार प्रणाम,
मैया बारम्बार प्रणाम ।

जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके,
कहां उसे विश्राम ।
अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारो,
लेत होत सब काम ॥

बारम्बार प्रणाम,
मैया बारम्बार प्रणाम ।

प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर,
कालान्तर तक नाम ।
सुर सुरों की रचना करती,
कहाँ कृष्ण कहाँ राम ॥

बारम्बार प्रणाम,
मैया बारम्बार प्रणाम ।

चूमहि चरण चतुर चतुरानन,
चारु चक्रधर श्याम ।
चंद्रचूड़ चन्द्रानन चाकर,
शोभा लखहि ललाम ॥

बारम्बार प्रणाम,
मैया बारम्बार प्रणाम

देवि देव! दयनीय दशा में,
दया-दया तब नाम ।
त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल,
शरण रूप तब धाम ॥

बारम्बार प्रणाम,
मैया बारम्बार प्रणाम ।

श्रीं, ह्रीं श्रद्धा श्री ऐ विद्या,
श्री क्लीं कमला काम ।
कांति, भ्रांतिमयी, कांति शांतिमयी,
वर दे तू निष्काम ॥

बारम्बार प्रणाम,
मैया बारम्बार प्रणाम ।

॥ माता अन्नपूर्णा की जय ॥

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