देवउठनी एकादशी 2017 पूजा विधि महत्व और तुलसी विवाह की कथा

देवउठनी एकादशी 2017 : देवउठनी एकादशी प्रबोधनी एकादशी के नाम से भी जानी जाती है | या ये कहे की पापो से मुक्ति देने वाली एकदशी, इस एकादशी का महत्व बहुत अधिक है | यह एकादशी दिवाली के 10 दिन बाद आती है | इस एकादशी के दिन से सभी मंगल कार्य प्रारम्भ होते है | कहा जाता है की इस एकादशी का पुण्य राजसूय यज्ञ करने से कही ज्यादा है |

Devushthane Ekadashi

देव उठनी एकादशी पूजा विधि  Devuthani Ekadashi Puja Vidhi 

पुराणों में बताया गया है की देव उठनी एकादशी से चार माह पहले इसी दिन भगवान विष्णु और अन्य सभी देवता क्षीरसागर में जाकर सो गए थे | कहा जाता है की इन दिनों में कोई शुभ कार्य नहीं होता है | सिर्फ पूजा पाठ एवं तप व दान के कार्य किये जाते है | कहा जाता है की इन चार महीनो में शादी, मुंडन संस्कार, नाम करण आदि कार्य नहीं किये जाते हैं |

देव उठनी ग्यारस प्रबोधिनी एकादशी दिन व दिनांक 2017 Ekadashi Day and Date 

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन देव उठनी एकादशी (ग्यारस) अथवा प्रबोधिनी एकादशी मनाई जाती हैं | मंगलवार 31 अक्टूबर 2017

देउठनी एकादशी पारण ,व्रत और पूजा का समय : Devuthani Ekadashi Paaran

  • प्रथम पारण (व्रत तोड़ने का) समय = 07: 3 9 से 08:26
  • पारण तिथि के दिन द्वादसी समाप्ति के समय = 08:26
  • एकदशी की तारीख प्रारम्भ = 30 अक्टूबर 2017 को 9 : 33 बजे
  • एकदिवसीय तिथि समाप्त = 31 अक्टूबर 2017 को 0 9 : 25 बजे

देउठनी ग्यारस का महत्व : Importance of Devushthane Ekadashi

एकादशी का महत्व

पुराणों के अनुसार हिन्दू धर्म में एकादशी के व्रत को महत्वपूर्ण माना जाता है | कहा जाता है की कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन सूर्य और अन्य गृह अपनी स्थिती में परिवर्तन करते हैं | जिस के कारण मनुष्य की इन्द्रियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है | इस कारण इन्द्रियों को संतुलन बनाये रखने के लिए व्रत करना जरुरी है | इस एकादशी को पाप का विनाश करने वाली एकादशी भी कहा जाता है | वेदों में कहा गया है की इस एकादशी का व्रत करने से पुण्य की प्राप्ति होती है जो कई तीर्थ दर्शन,अश्वमेघ यज्ञ ,सौ राजसूय यज्ञ के तुल्य माना गया हैं | इस दिन का महत्व ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को बताया है | और उन्होंने कहा की इस दिन एकाश्ना करने से एक जन्म, रात्रि भोज से दो जन्म व पूर्ण व्रत पालन से साथ जन्मो के पापो का नाश होता हैं | इस एकादशी का उपवास करने से सभी मनोकामना पूरी होती है |

देवउठनी ग्यारस या एकादशी व्रत पूजा विधि और संकल्प : Devushthane Ekadashi Vrat Puja Vidhi

एकादशी पूजा विधि

देवउठनी ग्यारस को व्रत  के दिन सूर्योदय से पूर्व नित्य कार्य करके व्रत का संकल्प ले | और सूर्य भगवान का अर्ध्य अर्पित करे | पुराणों में कहा गया है की यदि आप स्नान नदी के तट अथवा कुँए पर करे तो बहुत शुभ माना जाता है | इस दिन निरहार उपवास किया जाता है | दुसरे दिन दवाद्शी (बारस) को पूजा करके व्रत का उदायपन कर भोजन करना चाहिए | इस दिन बैल पत्र, शमी पत्र एवम तुलसी चढाने का और तुलसी विवाह का महत्व बताया गया हैं |

तुलसी विवाह : Tulsi Vivaha 

Tulsi Vivaha Puja Vidhi

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी (ग्यारस) के दिन तुलसी का विवाह किया जाता है | तुलसी का विवाह कई लोग द्वादशी के दिन भी करते है | यह हम आपको तुलसी विवाह के महत्व के बारे में बताने जा रहे है | कहा जाता है की तुलसी का पेड़ बहुत ही गुणकारी होता है | तुलसी के पेड़ से वातावरण शुद्ध रहता है |

तुलसी विवाह की कथा : Tulsi Vivaha  Katha

तुलसी विवाह की कथा : पौराणिक काल में राक्षस कुल में एक लडकी का जन्म हुआ जिसका नाम वृंदा था | वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु जी की भक्ति करती थी | वृंदा का विवाह राक्षस कुल के दानव राज जलंधर से किया गया |जलंधर जो समुद्र मंथन से उत्पन हुआ था | वृंदा पतिव्रता स्त्री थी | एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ | युद्ध में जाने पर वृंदा ने कहा की आप जब तक युद्ध करोगे में तब तक में आपकी जीत का अनुष्ठान करुँगी |

वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गई | उनके व्रत के प्रभाव से देवताओ में खलबली मच गई तो वो भगवान विष्णु के पास गए |भगवान विष्णु ने कहा की वह तो मेरी परम भक्त है |में उसके साथ ऐसा नहीं कर सकता हु परन्तु देवा इस के अलावा और कोई उपाय नहीं है |आप ही हमारी मदद कर सकते है |जब भगवान जलंधर का रूप धारण करके वहा गए तो वृंदा जलंदर को देख कर खडी हो गई और उसके पैर छू लिए | तब वृंदा का संकल्प टूट गया | फिर देवताओ ने जलंधर का सिर धड से अलग कर दिया | जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पड़ा है | तब वृंदा ने भगवान को श्राप दे दिया और कह तुम पत्थर के हो जाओ |

सभी देवता में हाहाकार होने लगी उस वक्त लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्राथना करने लगीं तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया | तब वृंदा अपने पति को लेकर सती हो गई | उनकी भस्म (राख ) से एक पौधा निकला | तब भगवान विष्णु ने कहा की इसका नाम तुलसी है |मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से जाना जायेगा जो तुलसीजी के साथ ही पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी जी के प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा | तब से तुलसी की पूजा सब लोग करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास की एकादशी के दिन किया जाता है | कहा जाता है की तुलसी के सदगुणों के कारण भगवान विष्णु ने उनके अगले जन्म में उनसे विवाह किया | देवउठनी एकादशी के दिन को तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। इसी प्रकार चार महा से बंद पड़े सभी शुभ कार्यो का शुभारम्भ होता है | इस दिन कन्या दान को सबसे बड़ा दान माना जाता हैं | कई लोग तुलसी का दान करके कन्या दान का पुण्य प्राप्त करते है |

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