Mokshagundam Visvesvaraya Biography Wikipedia Life Story in Hindi डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जीवनी जीवन कहानी

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Mokshagundam Visvesvaraya Biography Wikipedia

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Mokshagundam Visvesvaraya Biography Personal Life

पूरा नामडॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया
जन्म15 सितम्बर, 1861
जन्म स्थानमैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक गाँव में
पिता का नामश्रीनिवास शास्त्री
माता का नामवेंकाचम्मा
नागरिकताभारतीय
प्रसिद्धिइंजीनियर, वैज्ञानिक और निर्माता
पदमैसूर के दीवान
शिक्षाइंजीनियरिंग
विद्यालय का नामपूना इंजीनियरिंग कॉलेज
पुरस्कार-उपाधिभारत रत्न
मृत्यु14 अप्रैल, 1962

Mokshagundam Visvesvaraya Birthday & Family Details

विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में (Mokshagundam Visvesvaraya Date of Birth) 15 सितंबर 1860 को एक तेलुगु परिवार में हुआ था | उनके (Mokshagundam Visvesvaraya Parents) पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था | पिता संस्कृत के विद्वान थे |

Mokshagundam Visvesvaraya Education Qualification Details

विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्मस्थान से ही पूरी की | आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बंगलूर के सेंट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया | लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था | अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा | विश्वेश्वरैया ने 1880 में बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया | इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया | 1883 की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया | इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया |

Mokshagundam Visvesvaraya Career History Information in Hindi

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्हें मुंबई के PWD विभाग में नौकरी मिल गयी | उन्होंने डेक्कन में एक जटिल सिंचाई व्यवस्था को कार्यान्वित किया | संसाधनों और उच्च तकनीक के अभाव में भी उन्होंने कई परियोजनाओं को सफल बनाया | इनमें प्रमुख थे कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय और बैंक ऑफ मैसूर | ये उपलब्धियां एमवी के कठिन प्रयास से ही संभव हो पाई |

मात्र 32 साल के उम्र में सुक्कुर (सिंध) महापालिका के लिए कार्य करते हुए उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को जल आपूर्ति की जो योजना उन्होंने तैयार किया वो सभी इंजीनियरों को पसंद आया | अँगरेज़ सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए एक समिति बनाई | उनको इस समिति का सदस्य बनाया गया | इसके लिए उन्होंने एक नए ब्लॉक प्रणाली का आविष्कार किया | इसके अंतर्गत उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था | उनके इस प्रणाली की बहुत तारीफ़ हुई और आज भी यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है |

Mokshagundam Visvesvaraya Story

उन्होंने मूसा व इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी योजना बनायीं थी | इसके बाद उन्हें वर्ष 1909 में मैसूर राज्य का मुख्य अभियन्ता नियुक्त किया गया | वो मैसूर राज्य में आधारभूत समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि को लेकर भी चिंतित थे | इन समस्याओं से निपटने के लिए उन्होंने ने ‘इकॉनोमिक कॉन्फ्रेंस’ के गठन का सुझाव दिया | इसके बाद उन्होंने मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण कराया | चूँकि इस समय देश में सीमेंट नहीं बनता था इसलिए इंजीनियरों ने मोर्टार तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था |

Mokshagundam Visvesvaraya Life Story

लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण वह अशिक्षा को मानते थे | उन्होंने अपने कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 कर दिया | इसके साथ ही विद्यार्थियों की संख्या भी 1,40,000 से 3,66,000 तक पहुंच गई | मैसूर में लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल तथा पहला महारानी कॉलेज खुलवाने का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को ही जाता है | उन दिनों मैसूर के सभी कॉलेज मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध थे | इसके अलावा उन्होंने श्रेष्ठ छात्रों को अध्ययन करने के लिए विदेश जाने हेतु छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था की | उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग व औद्योगिक कालेजों को भी खुलवाया |

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Mokshagundam Visvesvaraya in Hindi

उनके इंजीनियरिंग के असाधारण कार्यों में मैसूर शहर में कन्नमबाडी या कृष्णराज सागर बांध बनाना एक महत्त्वपूर्ण कार्य था | उसकी योजना सन् 1909 में बनाई गई थी और सन् 1932 में यह पूरा हुआ | बम्बई प्रेसीडेन्सी में कई जलाशय बनाने के बाद, सिंचाई व विद्युत शक्ति के लिए उन्होंने कावेरी नदी को काम में लाने के लिए योजना बनाई | विशेषकर कोलार स्वर्ण खदानों के लिए दोनों ही महत्त्वपूर्ण थे | बांध 124 फुट ऊँचा था, जिसमें 48,000 मिलियन घन फुट पानी का संचय किया जा सकता था | जिसका उपयोग 150,000 एकड़ भूमि की सिंचाई और 60,000 किलो वाट्स ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए होना था |

उस समय कृष्णराज सागर बांध भारत में बना सबसे बड़ा जलाशय था | इस बहुउद्देशीय परियोजना के कारण अनेक उद्योग विकसित हुए, जिसमें भारत की विशालतम चीनी मिल, मैसूर चीनी मिल भी शामिल है | अपनी दूरदृष्टि के कारण, विश्वेश्वरैया ने परिस्थिति विज्ञान के पहलू पर भी पूरा ध्यान दिया | मैसूर शहर में आने वाला प्रत्येक यात्री कृष्णराज सागर बांध और उसके पास ही स्थित प्रसिद्ध वृन्दावन गार्डन देखना एक आवश्यक कार्य मानता था | वहाँ फव्वारों का जल प्रपात, मर्मर पक्षी और आकर्षक फूलों की बहुतायत देखते ही बनती थी |

Dr Mokshagundam Visvesvaraya Award Details
  • 1904 में उन्हे लगातार 50 साल तक लन्दन इंस्टिट्यूट ऑफ़ सिविल इंजीनियर्स की मानद सदस्यता से नवाजा गया था |
  • 1906 उनकी सेवाओं की मान्यता में 1906 में मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैयाको केसर-ए-हिंद की उपाधि से सम्मानित किया गया |
  • 1911 में कम्पैनियन ऑफ़ द इंडियन एम्पायर (CIE)
  • 1915 में नाइट कमांडर ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ थे इंडियन एम्पायर (KCIE)
  • 1921 कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ़ साइंस से सम्मानित किया गया |
  • 1931 में उन्हे बॉम्बे विश्वविद्यालय द्वारा LLD की उपाधि से सम्मानित किया गया था |
  • 1937 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा D. Litt की उपाधि से सम्मानित किया गया था |
  • 1943 में इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (भारत) के आजीवन मानद सदस्य निर्वाचित किया गया था |
  • इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा D.Sc. – 1944
  • 1948 में मैसूर विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट – LLD से नवाज़ा गया |
  • 1953 में आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा D.Litt से सम्मानित किए गए |
  • उन्हे 1953 में इंस्टिट्यूट ऑफ़ टाउन प्लानर्स ( भारत) के मानद फैलोशिप से सम्मानित किया गया |
  • 1955 में भारत रत्न से सम्मानित हुए |
  • 1958 बंगाल की रॉयल एशियाटिक सोसायटी परिषद द्वारा ‘दुर्गा प्रसाद खेतान मेमोरियल गोल्ड मेडल |
  • 1959 में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस द्वारा फैलोशिप से नवाजा गया |
Mokshagundam Visvesvaraya Book

भारत का पुनर्निर्माण (1920)
भारत के लिये नियोजित अर्थ व्यवस्था (1934)

चिर यौवन का रहस्य

भारत-रत्न से सम्मानित डॉ॰ मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया ने सौ वर्ष से अधिक की आयु पाई और अन्त तक सक्रिय जीवन व्यतीत किया | एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, ‘आपके चिर यौवन का रहस्य क्या है?’ डॉ॰ विश्वेश्वरैया ने उत्तर दिया, ‘जब बुढ़ापा मेरा दरवाज़ा खटखटाता है तो मैं भीतर से जवाब देता हूं कि विश्वेश्वरैया घर पर नहीं है | और वह निराश होकर लौट जाता है | बुढ़ापे से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पाती तो वह मुझ पर हावी कैसे हो सके |

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Mokshagundam Visvesvaraya Death Date

14 अप्रैल 1962 को बेंगलुरु में 102 साल की आयु में मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की मृत्यु हो गई |

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