शरद पूर्णिमा 2019 तारीख समय व्रत विधि कथा और महत्व

शरद पूर्णिमा 2019 : ज्योतिसियो के अनुसार शरद पूर्णिमा आश्विन मास की पूर्णिमा वर्ष भर में आनेवाली सभी पूर्णिमा से श्रेष्ठ मानी गई है। इसे शरद पूर्णिमा के अलावा कोजागर पूर्णिमा व रास पूर्णिमा भी कहते हैं। कहा जाता है की इस दिन इस दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। और इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। विद्वानों के अनुसार इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। चंद्रमा की किरणों में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखना लाभदायी बताया जाता है।

  • 13 अक्टूबर 2019 
  • चन्द्रोदय का समय 13 अक्टूबर की शाम 05 बजकर 26 मिनट
  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 13 अक्टूबर की रात 12 बजकर 36 मिनट से
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त 14 अक्टूबर की रात 02 बजकर 38 मिनट तक

शरद पूर्णिमा की व्रत विधि : Sharad Purnima Vrat Vidhi

कहा जाता है की व्यक्ति इस दिन व्रत के साथ अपने मन को साफ़ रखना चाहिय | कोई भी व्यक्ति तांबे या मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके उसकी पूजा करनी चाहिए | शाम के समय चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए 101 दीपक जलाने चाहिए | इस के बाद खीर तैयार करे | उसे शुद्ध पत्र में डाल कर उसे चंद्रमा की चांदनी में रखे | इसे एक पहर या 3 घंटे बाद लक्ष्मी को अर्पित करे | इसके बाद यह खीर सात्विक ब्राह्मणों को प्रसाद के रूप में परोसे या इसका भोजन करवाए | इस दिन आप भजन कीर्तन भी कर सकते है | सुबह के समय स्नान करके लक्ष्मीजी वह प्रतिमा किसी आचार्य को देदे | कहा जाता है की सर्दपूर्णिमा की रात महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं | और मन ही मन संकल्प करती है की कोन मेरी सेवा कर रहा ही कोण नहीं और जमीं पर कोन मेरे लिए जागकर मेरी पूजा कर रहा है | उस व्यक्ति को में आज घन का भंडार दूंगी | इस प्रकार प्रतेक वर्ष किया जाने वाला शरद पूर्णिमा का उपवास लक्ष्मीजी को संतुष्ट और प्रसन्न करने के लिए करते है | कहा जाता है की मा लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

शरद पूर्णिमा की पौराणिक कथा Legend of Sharad Purnima

एक बार एक साहूकार के दो लडकिया थी | दोनों लड़किया सरद पूर्णिमा का उपवास करती थी | उनमे बड़ी लड़की जो सम्पूर्ण उपवास करती थी और छोटी लड़की अधुरा उपवास करती थी | साहूकार ने दोनों लडकियों का विवहा कर दिया | उनमे छोटी लड़की के पुत्र प्राप्त होता और वह मर जाता था | उसने पंडित से इस का कारण पूछा तो पंडित ने लड़की को बताया की आपने पूर्णिमा उपवास अधुरा किया था | जिसके कारण तुम्हारी सन्तान होते ही मर जाती है |अगर तुम पूर्णिमा का विधिपूर्वक उपवास करोगी तो तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है। तब से लड़की ने विधि पूर्वक उपवास किया | उसके लड़का पैदा हुआ | परन्तु वह तुरंत ही मर गया | उसने लड़के को चोकी पर लेटा दिया और कपडे से ढक दिया | वह तुरंत बड़ी बहन के पास गई और उसे बुलाकर लाई और बेठने के लिए वही चोकी दे दी | चोकी पर बड़ी बहन ज्योही बेठने लगी तो उसके लहगे की लावन उस लड़के के लग गई | तो लड़का रोने लगा | उसकी बड़ी बहन ने कहा की तू मुझे कलंकित करना चाहती थी ये मेरे बेठने से मर जाता तो छोटी बहन ने कहा ये तो पहले से ही मारा हुआ था | तेर ही भाग्य और पुण्य से जीवित हुआ है | उसके बाद पुरे गाँव में पूर्णिमा का उपवास करने का ऐलान करवा दिया |

शरद पूर्णिमा पर रावण की योवन शक्ति का रहस्य The secret of Yavan power of Ravana on Sharad Purnima

शास्त्रों के अनुसार कहा जाता है की शरद पूर्णिमा की रात लंकापति रावण अपनी नाभि में चन्द्रमा की किरणों ग्रहण करता था | ऐसा करने से रावण को पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी और यह भी कहा जाता है की जो व्यक्ति कम कपड़ो में रहता है उसे चन्द्रमा की ऊर्जा प्राप्त होती है। सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है | वैज्ञानिको का कहना है की दूध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर को खुले आसमान में रखने का विधान बनाया है। और यह भीकहा जाता है की अगर खीर को चांदी के बर्तन में बनया जाये तो और भी उपयोगी होती है |क्यों की चांदी के पात्र की प्रतिरोधकता क्षमता अधिक होती है | जिससे विषाणु दूर रहते हैं। ऋषि-मुनियों का कहना है की प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 1 घंटे तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। और यह भी कहा गया है की अगर शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों को यह खीर खिला दी जाये तो उनका दमा रोग चला जाता है |

शरद पूर्णिमा का महत्व Importance of Sharad Purnima

हिन्दू पंचांग के आनुसार शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी पूर्णिमा से ज्यादा है | क्यों की आशिवन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है | शास्त्रों में इस पूर्णिमा का महत्व बताया गया है | कहा जाता है की धन की देवी माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था | इस लिए इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है |

द्वापर युग में भगवन श्री कृष्ण का जन्म हुआ था | तब मा लक्ष्मी के रूप में धरातल में अवतरित हुई थी | कहा जाता है की शरद पूर्णिमा की रात भगवन श्री कृष्ण ने बंशी बजाकर गोपियों को अपने पास बुलाय था | और उनसे रास रचाई थी |इसलिए इसे “रास पूर्णिमा या कामुदी “महोत्सव भी कहा जाता है | अत : सरद पूर्णिमा की रात्री का विशेष महत्व है |

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार शरद पूर्णिमा की मध्य रात्री के बाद माता लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर सवार होकर धरती पर आई थी | वह यह देखने की कौन को जाग रहा है | इसलिए इस पूर्णिमा की रात को “कोजागरा” भी कहा जाता है | “कोजागरा”का अर्थ है कौन जाग रहा है | कहते है की जो भक्त रात में जागकर मा लक्ष्मी की पूजा अर्चना करते है | उन पर माता लक्ष्मी अवश्य ही प्रसन होती है |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.