श्राद्ध पूजा 2017 का नियम पितृ कर्म का महत्त्व तिथियां पितृ दोष और उसके प्रभाव

पुराणों में कहा गया है की अश्विन माह की कृष्णा पक्ष में श्रद्धा या पितृयज्ञ या श्राद्धकर्म का आयोजन किया जाता है | आश्विन कृष्ण पक्ष पितर पक्ष में सूर्य कन्या राशी में रहता है | जो इस पक्ष में अपने पूर्वजो के श्राद्ध करता है | तो श्राद्ध से पितृ तृप्त हो जाते है | कन्या राशी में सूर्य रहने पर श्राद्ध नहीं होते है |

shradh pooja

श्राद्ध पूजा इसलिए की जाती है जो निम्न प्रकार है

श्राद्ध पूजा की मान्यता Recognition of Shraddha Puja

पुराणिक कथाओ के मान्यता के आधार पर कहा जाता है की मनुष्य की मोत के बाद भी उसकी आत्मा दुसरे शारीर में प्रवेश करने के लिए इधर-उधर भटकती रहती है | तब उसे मोक्ष की प्राप्ति के लिए पितृ पूजा का कार्यक्रम बनाया गया है

श्राद्ध पूजा का नियम Rule of Shraddha Pooja

कहा जाता है की श्राद्ध पक्ष में व्यसन और मांसाहार पूर्णतय वर्जित बताया गया है। पूर्ण पवित्र रहकर ही श्राद्ध पक्ष किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य करना मना हैं। कहा जाता है की श्राद्ध का समय दोपहर 12:30 बजे से 01 बजे के बीच का समय श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन कौओं, गायों भोजन खिलते है| क्योंकि कहा जाता है की ये सभी जीव यम के काफी नजदीकी हैं।

श्राद्ध पूजा और आत्मा का सम्बन्ध

पुराणों के अनुसार इन्सान की मृत्यु के बाद भी उसकी आत्मा नहीं मरती है | भागवत गीता में लिखा है की इन्सान का शारीर मर सकता है पर उसकी आत्मा अमर रहती है | और वह अपनी इच्छाओ की प्रति के लिए विभिन्न प्रकार के शरीरो का इस्तेमाल करती है | भगवत गीता के अनुसार अपने शारीर को त्यागने के बाद उसका कोई महत्व नहीं रह जाता है और ना ही कोई उसका सरोकार रहता है | कहा जाता है की भगवान् श्रीकृष्ण ने अभिमन्यु की मृत्यु के बाद अर्जुन को अपने पुत्र से मिलने के लिए स्वर्ग भेजा था | परन्तु अर्जुन को अहशास तब हुआ जब अभिमन्यु ने अपने पिता को पहचानने से इंकार कर दिया। तब अर्जुन को श्रीकृष्ण की बताई हुई बात का सार समझ में आया।

पितृ या श्राद्ध पूजा क्या है What is pitra or shradha puja

कहा जाता है की यह एक विशेस प्रकार की पूजा है जिसे आत्मा की शांति के लिए पूजा की जाती है  |और इस पूजा के पीछे क्या कारण है  |इस को समझने की आवस्यकता है  जो इस प्रकार है

कर्मों के आधार पर स्वर्ग या फिर नर्क

हिन्दू धर्म के अनुसार कहा गया है की आदमी जैसे कर्म करता है वैसा ही उसे स्थान मिलता है अगर व्यक्ति ने अच्छे कर्म किये तो उसे स्वर्ग में जगह मिलेगी | और बुरे कर्म करेगा तो उसे नरक में स्थान मिलेगा | परन्तु यहाँ तक आने के लिए उसकी आत्मा भटकती रहती है | जिसके लिए यह विधान बनया गया है | और शास्त्रों में कहा गया है की मनुष्य को उसके कर्मो के आधार पर ही मोक्ष की प्राप्ति होती है | प्रेत योनि जो दोनों योनि के बीच में है प्रेत योनि, जिससे बाहर आने में ही आत्मा को काफी समय लग जाता है। यह वह समय होता है जब आत्मा वायु रूप में पृथ्वी पर ही भटकती रहती है।

Pind daan

पितृ योनि का मतलब

जिन वस्तुओ का आभास मनुष्य को अपने आसपास होता है | वह वही हैं जो प्रेत योनि में विचरण कर रही होती हैं। इस आत्मा को इसी प्रेत योनि से बाहर निकाल आगे के चरण यानि के पितृ चरण तक पहुंचाने के लिए ही पितृ पूजा की जाती है।
कब आते है श्राद्ध और कितने होते है

भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक 16 दिनों तक का समय 16 श्राद्ध या श्राद्ध पक्ष कहलाता है। यह वही समय है जब शास्त्रों के अनुसार देवकार्यों से पूर्व पितृ कार्य करने का निर्देश दिया गया है। ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध से केवल पितृ ही तृप्त नहीं होते अपितु समस्त देवों से लेकर वनस्पतियां तक तृप्त हो जाती हैं।

पिंडदान एवं ब्राह्मण भोजन

हिन्दू मान्यता के अनुसार श्राद्ध की दो प्रक्रियाएं होती हैं पहली है पिंडदान और दूसरी ब्राह्मण भोजन। ऐसा कहा जाता है कि ब्राह्मण के मुख से देवता हव्य को तथा पितृ कव्य को खाते हैं। पितृ स्मरण मात्र से ही श्राद्ध प्रदेश में आते हैं तथा भोजनादि प्राप्त कर तृप्त होते हैं। ब्राह्मण भोजन के साथ पंचबलि कर्म भी होता है जिसका विशेष महत्व है।ब्राह्मणों के भोजन को पूर्ण विधि-विधान से करवाया जाए।

श्राद्ध के लिए बलि देना

पुराणों के अनुसार श्राद्ध में पांच प्रकार की बलि बताई गई हैं- गौ बलि, श्वान बलि, काक बलि, देवादि बलि तथा पिपीलिका बलि। यहां बलि का अर्थ है उसी से संबंधित पशु-पक्षी को भोजन खिलाना होता है। इसे ही शास्त्रों में बलि माना गया है |

सर्वपितृमोक्ष अमावस्या

किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए। यही उचित भी है।

पितृ दोष और उसके प्रभाव Pitfall and its effect

कहा जाता है की यदि किसी घर में अकाल मृत्‍यु की घटना बार-बार होती है, अथवा घर में होने वाली ज्‍यादातर मृत्‍यु अचानक, अविश्‍वसनीय व रहस्‍यमय तरीके से होती है | अथवा घर के ज्‍यादातर लोग हद से ज्‍यादा शंकालु या मानसिक रोगी होते हैं और अच्‍छे से अच्‍छे डॉक्‍टर का ईलाज करवाने के बावजूद यदि इस प्रकार की बिमारियों में फर्क नहीं पडता और घर में दुर्घटनाओं व परेशानियों का दौर बदस्‍तूर जारी रहता है, तो इस प्रकार के घरों को पितृ दोष से प्रभावित माना जा सकता है और ऐसे लोगों को श्राद्ध जरूर करना चाहिए तथा घर में जिनकी भी अकाल मृत्‍यु हुई हो, उनकी आत्‍मा की शान्ति के लिए पिण्‍डदान जरूर करवाना चाहिए, ऐसी हिन्‍दु धर्म की मान्‍यता है।

Shraddha Day 2017

05 Sept    Tuesday        Purnima Shraddha

06 Sept Wednesday Pratipada Shraddha

07 Sept Thursday Dwitiya Shraddha

08 Sept Friday        Tritiya Shraddha

09 Sept Saturday Chaturthi Shraddha

10 Sept Sunday   Maha Bharani, Panchami Shraddha

11 Sept Monday   Shashthi Shraddha

12 Sept Tuesday        Saptami Shraddha

13 Sept Wednesday Ashtami Shraddha

14 Sept Thursday Navami Shraddha

15 Sept Friday   Dashami Shraddha

16 Sept Saturday Ekadashi Shraddha

17 Sept Sunday        Dwadashi Shraddha, Trayodashi Shraddha

18 Sept Monday   Magha Shraddha, Chaturdashi Shraddha

19 Sept Tuesday        Sarva Pitru Amavasya

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