श्रावणी पूर्णिमा 2017 श्रावण पूर्णिमा की पूजा विधि व्रत कथा और महत्व

श्रावणी पूर्णिमा 2017 : साल 2017 में श्रावणी पूर्णिमा 7 अगस्त को है। लेकिन इस बार पूजा शुभ मुहूर्त देखकर करनी चाहिए । क्योंकि सूर्योदय के समय से लेकर कुछ घंटों तक भद्रा का साया पूर्णिमा पर है तो साथ ही इस दिन चंद्रमा को ग्रहण भी लग रहा है। इसलिये पूजा पाठ के लिये भद्रा के पश्चात और चंद्र ग्रहण के सूतक लगने से पहले का समय ही उचित है।

श्रावण मास की महिमा

हिन्दू कलेंडर मैं 12 मास होते हैं उन 12 महीनों मैं श्रावण के महीने की एक अलग ही महिमा हैं | श्रावण का वो महिना जिसमे ठंडी ठंडी सुहावनी हवा ,और वर्षा ऋतु के बादलों से बरसती बारिश की रिमझिम फुहार जो हर किसी के मन को सीतल और आनंदमय बना देती हैं ऐसा श्रावण का महिना किसको नहीं भायेगा | श्रावण के महीने मैं कावड लाई जाती हैं ,कावडिय ‘बोल बम तड़क बम “ का जयघोष करते हुए दूर दूर से कावड लेकर आते है और मंदिर मैं शिवजी का जलाभिषेक करते हैं इस प्रकार कावड़ियों का ये नजारा आम आदमी के मन को मोह लेता हैं | तीर्थ स्थानों पर कावड़ियों के मेले लगते हैं रंगारंग कार्यक्रम होते हैं इस प्रकार श्रावण के महीने मैं एक अनुपम छटा देखने को मिलती हैं | श्रावण के महीने मैं सबसे अधिक त्योंहार आते हैं जैसे – श्रावण मास के शरू होते ही तीज का त्योंहार आता हैं उसके बाद नाग पंचमी आती हैं और उसके बाद श्रावण पूर्णिमा आती है और उसी दिन रक्षाबंधन आता हैं | श्रावण के महीने मैं शिव भक्त पुरे श्रावण शिवजी का जल अभिषेक करते हैं और महिलाएं श्रावण स्नान करती हैं श्रावण के सोमवार का व्रत किया जाता हैं और पूरे श्रावण एक टाइम भोजन किया जाता हैं ,इस प्रकार यह महिना देव देवताओं को खुश करने का महिना हैं जो महिला या पुरुष श्रावण के पुरे महीने माँ पार्वती और शिवजी की सच्चे मन से पूजा करते हैं उनकी भगवान शिव सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं | इस प्रकार श्रावण के महीने मैं मुख्य रूप से शिवजी की पूजा की जाती हैं | पुरे श्रावण मास मैं भगवान शिव की पूजा की जाती है और आखिर मैं श्रावण पूर्णिमा के दिन कंवारी कन्याये और गरीब ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता हैं,मंगते ,भिखारियों को पैसे और कपड़ो का दान दिया जाता हैं श्रावण मास की पूर्णिमा का बड़ा ही महत्व हैं | shravan purnima

श्रावणी पूर्णिमा और रक्षाबंधन

श्रावणी पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। यह श्रावण मास की पूर्णिमा है, जिसमें ब्राह्मण लोग अपनी कर्म शुद्धि के लिए उपक्रम करते हैं। ग्रंथों में इस दिन किए गए तप और दान का महत्त्व उल्लेखित किया गया है। इस दिन ‘रक्षाबंधन’ का पवित्र त्यौहार मनाया जाता है। इसके साथ ही श्रावणी उपक्रम, श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को आरम्भ होता है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में श्रावणी कर्म का विशेष महत्त्व बतलाया गया है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन ‘यज्ञ पूजन ‘तथा उपनयन संस्कार का भी विधान है।

श्रावण पूर्णिमा का महत्व

जैसा कि इस लेख के उपरोक्त पैरा में भी उल्लेख किया गया है कि पूर्णिमा की प्रत्येक तिथि शुभ और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन श्रावण पूर्णिमा की अपनी अलग विशेषता है। इस दिन देश भर में विशेषकर उत्तर भारत में रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाया जाता है। यही तिथि दक्षिण में नारियली पूर्णिमा और अवनी अवित्तम के रूप में मनाई जाती है। मध्य भारत में इसे कजरी पूनम तो गुजरात में पवित्रोपना के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कुछ क्षेत्रों में यज्ञोपवीत पूजन एवं उपनयन संस्कार करने का विधान भी है। जप-तप, दान-दक्षिणा के लिये यह तिथि श्रेष्ठ मानी ही जाती है। इसी दिन अमरनाथ यात्रा का समापन भी होता है। चंद्रदोष से मुक्ति के लिये भी यह तिथि श्रेष्ठ मानी जाती है।  

श्रावण पूर्णिमा व्रत व पूजा विधि

श्रावण मास की पूर्णिमा पर वैसे तो विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न पर्वों के अनुसार पूजा विधियां भी भिन्न होती हैं। लेकिन चूंकि इस दिन रक्षासूत्र बांधने या बंधवाने की परंपरा है तो उसके लिये लाल या पीले रेशमी वस्त्र में सरसों, अक्षत, रखकर उसे लाल धागे (मौली या कच्चा सूत हो तो बेहतर) में बांधकर पानी से सींचकर तांबे के बर्तन में रखें। भगवान विष्णु, भगवान शिव सहित देवी-देवताओं, कुलदेवताओं की पूजा कर ब्राह्मण से अपने हाथ पर पोटली का रक्षासूत्र बंधवाना चाहिये। तत्पश्चात ब्राह्मण देवता को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा देकर उन्हें संतुष्ट करना चाहिये। साथ ही इस दिन वेदों का अध्ययन करने की परंपरा भी है। इस पूर्णिमा को देव, ऋषि, पितर आदि के लिये तर्पण भी करना चाहिये। इस दिन स्नानादि के पश्चात गाय को चारा डालना, चिंटियों, मछलियों को भी आटा, दाना डालना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि विधि विधान से यदि पूर्णिमा व्रत का पालन किया जाये वर्ष भर वैदिक कर्म न करने की भूल भी माफ हो जाती है। मान्यता यह भी है कि वर्ष भर के व्रतों के समान फल श्रावणी पूर्णिमा के व्रत से मिलता है।

श्रावणी पूर्णिमा को दान करने से होती हैं पुण्य की प्राप्ति

श्रावण पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ होता है, अत: इस दिन पूजा-उपासना करने से चंद्रदोष से मुक्ति मिलती है। श्रावणी पूर्णिमा का दिन दान, पुण्य के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए इस दिन स्नान के बाद गाय आदि को चारा खिलाना, चीटियों, मछलियों आदि को दाना खिलाना चाहिए। इस दिन गोदान का बहुत महत्त्व ग्रंथों में बतलाया गया है। श्रावणी पर्व के दिन जनेऊ पहनने वाला हर धर्मावलंबी मन, वचन और कर्म की पवित्रता का संकल्प लेकर जनेऊ बदलते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान देना और भोजन कराया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी की पूजा का विधान है। विष्णु-लक्ष्मी के दर्शन से सुख, धन और समृद्धि कि प्राप्ति होती है। इस पावन दिन पर भगवान शिव, विष्णु, महालक्ष्मीव हनुमान को रक्षासूत्र अर्पित करना चाहिए।  

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