उत्तर प्रदेश में प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक भर्ती को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 में शुरू हुई भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देने वाली दर्जनों याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट के फैसले के बाद करीब 13 साल से लंबित भर्ती प्रक्रिया के आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है।
क्या कहा हाईकोर्ट ने?
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड नियमावली, 1998 के अनुसार हुई है। इसलिए वर्ष 1983 की पुरानी नियमावली के आधार पर चयन प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी जा सकती।
याचिकाकर्ताओं की ओर से मांग की गई थी कि प्रत्येक संस्था में वरिष्ठतम शिक्षकों और सीधे भर्ती के अभ्यर्थियों की अलग-अलग तुलना की जाए। कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि 1998 की नियमावली में चयन के लिए अंक और अभ्यर्थियों की संस्थान संबंधी वरीयता के आधार पर पैनल तैयार करने की व्यवस्था है।
2022 में जारी हुई थी चयन सूची
इस भर्ती के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 25 फरवरी 2014 रखी गई थी। लंबी प्रक्रिया के बाद 11 और 13 नवंबर 2022 को क्षेत्रवार चयन सूची जारी की गई थी। चयन से असंतुष्ट अभ्यर्थियों ने इसके बाद हाईकोर्ट का रुख किया था।
कोर्ट ने चयन बोर्ड के केवल अध्यक्ष द्वारा परिणाम घोषित किए जाने की आपत्ति भी खारिज कर दी। कोर्ट ने माना कि अन्य सदस्य सेवानिवृत्त होने के बाद अध्यक्ष द्वारा परिणाम घोषित करना प्रशासनिक परिस्थितियों में वैध था।
नई भर्ती पर भी विवाद
इधर उत्तर प्रदेश में नई प्रधानाचार्य-प्रधानाध्यापक भर्ती को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। 4512 सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में 1172 प्रधानाचार्य और 1475 प्रधानाध्यापक पदों पर भर्ती प्रस्तावित है। आवेदन प्रक्रिया 8 अक्टूबर से शुरू होने की बात सामने आई है।
नई भर्ती में बीएड और परास्नातक में 50 प्रतिशत अंकों की अनिवार्यता को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं।
यानी एक तरफ 2013 से लंबित भर्ती को हाईकोर्ट के फैसले से आगे बढ़ने का रास्ता मिला है, तो दूसरी तरफ नई भर्ती की पात्रता को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया है।

